तुम निर्बाध हो, प्रवाह हो

July 18, 2017

दिल और दिमाग के पेच में उलझी हुई
नहीं नहीं ये तो तुम हो ही नहीं सकती
तुम निर्बाध हो, प्रवाह हो
और उससे भी बड़ी बात
कि तुम मेरी लेखनी की
पहली नायिका हो
सच में!
मैं आज भी वहीं हूं
और वहीं रहना भी चाहता हूं
जहां तुम में मेरी मां दिखी थी
वह लगाव आज भी जस का तस है
सभी रिश्ते-नातों के बीच
मैं जानता हूं सबकुछ,
शायद तुम को तुमसे ज्यादा
तुम छुपा भी नहीं सकती मुझसे
लेकिन
तुम तो आदर्श हो, प्रेरणा हो
सोच हो, साधना हो
और इसी कसौटी पर ही
नायिका सूत्रधार बनी रहेगी
मेरी हर रचना में
अपनी लेखनी से
तुम्हें अमर करने की चाह
बस यूं ही
जो शाब्दीक भी नहीं, भाषीक भी नहीं!
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यायावर

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