अखंड प्रवाहिनी! तू मौन है क्यूँ?

October 24, 2015

अखंड प्रवाहिनी!
तू मौन है क्यूँ?
किसने पूछा कि,
कौन है तू?

तेरा परिचय..
तू निर्मित है!
सृजन-नेह-सी..
मुखरित है!

तेरा हर क्षण,
निर्माण लिये|
जीवन में नया,
विधान लिये|
तेरी करूणा के,
आँचल में|
जीवन खिलता,
मुस्कान लिये!

मन का संबल,
तू कर अविचल|
तू पर्वत है, तू ही राई!
तेरा जीवन! नहीं है तेरा..
तू है हमसब की परछाई..!

उपहार तुझे यह भी कम है.
अपनी सांसें अर्पण कर दूँ!
तेरी इच्छा पूर्ण हो पहले..
सोच,.समस्त समर्पण कर दूँ!

तेरी किलकारी से देखो..
मौन धरा भी इठलाई!
करूणा, ममता, प्रेमझरा-सी..
तेरी आँचल जब लहराई…!

मृदु पलकों पर,
“आभा-सी” मुस्कान भरे !
जीवन की जीवटता का,
संधान धरे!
तुम्हें देख,
मन का अंतस है हरा-भरा!
सच बोलूं! तो तू है,
जग की “स्नेह-झरा!”

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