तुम निर्बाध हो, प्रवाह हो

July 18, 2017

दिल और दिमाग के पेच में उलझी हुई
नहीं नहीं ये तो तुम हो ही नहीं सकती
तुम निर्बाध हो, प्रवाह हो
और उससे भी बड़ी बात
कि तुम मेरी लेखनी की
पहली नायिका हो
सच में!
मैं आज भी वहीं हूं
और वहीं रहना भी चाहता हूं
जहां तुम में मेरी मां दिखी थी
वह लगाव आज भी जस का तस है
सभी रिश्ते-नातों के बीच
मैं जानता हूं सबकुछ,
शायद तुम को तुमसे ज्यादा
तुम छुपा भी नहीं सकती मुझसे
लेकिन
तुम तो आदर्श हो, प्रेरणा हो
सोच हो, साधना हो
और इसी कसौटी पर ही
नायिका सूत्रधार बनी रहेगी
मेरी हर रचना में
अपनी लेखनी से
तुम्हें अमर करने की चाह
बस यूं ही
जो शाब्दीक भी नहीं, भाषीक भी नहीं!
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यायावर


स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

February 5, 2012

स्वप्न के इस नीर में आकाश कितना!
है तिमिर को साधता प्रकाश कितना!

सुप्त कण के जागरण में तुम जुटे जब,
चेतना के अंक का आभास कितना!
हो रही है धूंध अपने ही गहर में
दिप्त होते बिम्ब में अवकाश कितना!
स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

स्याह-सा कुछ आवरण में कुढ़ता क्यों?
पथ से पथिक के मोह की मूढ़ता क्यों?
परिणाम के परिपथ में पिसता विश्वास कितना!
स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

पसरे हुए निर्वात में निमित्त समेटे,
बाती विधि की जल रही सबकुछ लपेटे।
जो जल रहा उसका है प्रवास कितना!
स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!


संभव रचना इतिहास नहीं|

October 15, 2010

यदि लुप्त हो मन का संबल,
स्वयंभूति विश्वास नहीं|
तो, यह सत्य अटल है इतना,
संभव रचना इतिहास नहीं|

किसका कितना दर्श करेगा,
किस-किस को स्पर्श करेगा|
यदि चेतना मृत हो तेरी,
तो, तू क्या स्पष्ट करेगा|
संशय की जिह्वा में लिपटी,
यह अनुभूति उपहास नहीं|
संभव रचना इतिहास नहीं|

हे! स्वयं तुम्हारा क्या परिचय?
क्यूँ परिभाषा तुम खोते?
तुम व्यक्त हुए तो, व्यक्ति हो,
अन्यथा पकड़ अब क्यूँ रोते|
अभी शेष संदर्भ तुम्हारा,
व्यथा कोई उपवास नहीं|
संभव रचना इतिहास नहीं|


विवश शब्द को ऋण कर दो!

February 27, 2010

पत्थरों का प्राण कहता,
युग भी निर्माण कहता|
कपकपाते होंठ कहतें,
पोंछ दो आंसू जो बहतें|

जीर्ण-जीर्ण को तृण कर दो,
विवश शब्द को ऋण कर दो|
आगमन में दसों दिशाएँ,
देख तुमको मुस्कुराएँ|
फिर बसंती वात बहती,
कूक कोयल क्या न कहती?
समझने की फेर कैसी?
समझ लो तो देर कैसी?
बंधनों पर प्रहार कर दो,
हर दिवस त्योहार कर दो|

अम्बर का आनन् न सूना,
अभी तुम्हें अम्बर है छूना|
ओज का तू दर्श कर ले,
दर्द का स्पर्श कर ले|
आस्था की मूर्तियों में,
तू मूर्तियों की आस्था है|
तू नहीं कुछ जानता है,
तू क्यूँ ऐसा मानता है?


“मैं” में मेरा मौन है|

December 31, 2009

खुरच रहा था उम्र को,
ये सोच कर पड़ाव पर|
मैं खाली हाथ क्यूँ रहा,
लक्ष्य के चढ़ाव पर|

समय के इस चक्र का,
आवर्तन क्यूँ अब गौण है?
मेरी इस आपत्ति पर,
स्वयं “मैं” में मेरा मौन है|

राह चलता ही रहा,
सूत्र के संधान में|
मेरी क्या है भूमिका,
विधि के विधान में|

शेष न संभव हो सका,
अवशेष के अन्तराल में|
गर्त में बढ़ता चला,
जो भी मिला उस काल में|


मृत्यु! आत्मा का अज्ञातवास!

October 13, 2009
दंभ निमित में मृगतृष्णा के,
गहन-सघन स्वांस अभ्यास|
पुनः व्यंजित वृत्त-पथ पर,
आत्मा का पुनरुक्ति प्रवास|
कल्प-कामना के अनंत में,
लिपिबद्ध अपूर्ण उच्छास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है, जीवनवास|

अवतरण का,
सत्य, मिथक क्या?
यह भ्रम, मन का,
पूर्वाग्रह है|
ज्ञात यही,
अवसर-प्रतिउत्तर|
जिस काया में,
बसता मन है|
पूर्वजन्म की स्मृति शेष,
ज्यौं पुनः न करती देह-अवशेष|
किंचित यह भी ज्ञात नहीं,
तब क्या था?
क्यूँ जीवन पाने का धर्म है?
पूर्व जन्म का दंड मिला,
या
यह अगले जन्म का दंड-कर्म है|
सत्य का संधान न पाकर,
निर्वात उकेरता एकांतवास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है, जीवनवास|

लिप्त कर्म में,
दीप्त कर्म में,
संचित धर्म,
निर्लिप्त आयाम|
कैसा दर्पण श्लेष दृष्टि का?
भूत-भविष्य का कैसा विन्यास?
क्यूँ भ्रम को स्थापित करते?
खंडित कर दो सारे न्यास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है जीवनवास|

जो निश्चय था,
तुम्हारे मन का|
पूर्ण से पहले,
वह अविचल है|
जो लिया यहीं से,
देकर जाओ|
यही कर्म है,
यहीं पर फल है|
त्याग-प्राप्ति संकल्प तुम्हारा,
है, तर्कविहीन तुष्टि का सन्यास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है जीवनवास|


राष्ट्रभाषा का तमगा मिले, तुम्हारी पैरवी करूँगा|

September 4, 2009

सुनो! तुम्हें आती है,
खिचड़ी  पकानी,
अंग्रेजी और हिंदी की|
नहीं आती न?
अच्छा! अंग्रेजी में हिंदी,
या हिंदी में अंग्रेजी का,
चटपटा पकवान बनाकार,
गर्व से सीना चौड़ा करके,
उसे परोसना|
कुछ तो सीखा होगा तुमने….
नहीं सीखा?
तब तो तुम,
बिलकुल नहीं चल पाओगे,
और बचा भी नहीं पाओगे,
अपने बचे-खुचे अवशेष को|
महसूस किया है तुमने,
अंग्रेजी के उन्माद को|
जब कोई बेटा हिंदी में,
अंग्रेजी मिलाकर,
अपनी माँ से कहता है-
“माँ आज तुम बहुत सेक्सी लग रही हो”
हा..हा..हा..! उस वक़्त..! उस वक़्त..!
माँ भी वातशल्य को,
क्षण-भर भूल,
निहारने लगती है,
अपने सोलहवें सावन को|
अपने पुराने ढर्रे पर,
चिपों-चिपों करते हो|
क्या हुआ तुम्हारी जननी,
संस्कृत का?
जिसके गर्भ में,
अविर्भाव हुआ था तुम्हारा!
वह भी गायब हो गयी न,
गदहे की सिंघ की तरह|
बात करते हो साहित्य की?
चलो मनाता हूँ,
साहित्य दर्शन है,
लेकिन ये बताओ कि,
दर्शन का भी,
संगठन होता है क्या?
और होती हैं क्या?
इसकी भी प्रतियोगिताएँ,
अपने व्यक्तित्व को,
श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिये|
हिंदुस्तान में,
तुम्हें शुद्ध बोलने वाले कम,
और तुम्हारे नाम की,
रोटी खानेवाले ज्यादा हैं,
गौर किया है कभी तुमने?
वर्ण, जाति, धर्म और
परंपरा का संगठन,
या फिर कोई भी,
मनचाह संगठन,
जानते हो कब बनता है?
इसके भी व्यतिगत रूप से,
बहुत पहलू हैं,
अपने-अपने हिसाब से|
लेकिन मुझे,
जो पहलू मुख्य लगता है,
वह है उसके लोप होने का भय|
अच्छा ये बताओ…
सुना है तुमने कभी,
कि शेरों ने मिलकर,
गीदडों  के खिलाफ,
बनाया हो संगठन|
हा! इतना ज़रूर है कि,
गीदड़ एक साथ मिलकर,
हुआं-हुआं करते हैं,
वो भी दिन में नहीं,
अमावस की रात में|
जानते हो,
तुम्हारी सबसे बड़ी,
विवशता क्या है?
तुम “एलीट” नहीं बन पाये|
तुम में कोई योगता नहीं,
कि तुम्हें राष्ट्रभाषा का,
तमगा मिले,
ये कैसे हो सकता है?
फिर भी मैं,
तुम्हारी पैरवी करूँगा|
कानूनी किताब में तुम,
हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा,
के नाम पर,
दर्ज कर दिए जाओगे|
लेकिन…
मेरे एक अंतिम प्रश्न,
का उत्तर दे दो|
यही तुम्हारी योग्यता,
मान बैठूँगा|
कहाँ से लाओगे,
अपने प्रेमियों को,
जो तुम में,
आस्था बनाये रखेंगे तबतक,
जबतक रहेगी ये सम्पूर्ण सृष्टी|
तुम चीटिंगबाज़ी करके,
दे सको अगर इसका उत्तर,
तो इस बात की भी,
तुम्हें छुट है….


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