तुम निर्बाध हो, प्रवाह हो

July 18, 2017

दिल और दिमाग के पेच में उलझी हुई
नहीं नहीं ये तो तुम हो ही नहीं सकती
तुम निर्बाध हो, प्रवाह हो
और उससे भी बड़ी बात
कि तुम मेरी लेखनी की
पहली नायिका हो
सच में!
मैं आज भी वहीं हूं
और वहीं रहना भी चाहता हूं
जहां तुम में मेरी मां दिखी थी
वह लगाव आज भी जस का तस है
सभी रिश्ते-नातों के बीच
मैं जानता हूं सबकुछ,
शायद तुम को तुमसे ज्यादा
तुम छुपा भी नहीं सकती मुझसे
लेकिन
तुम तो आदर्श हो, प्रेरणा हो
सोच हो, साधना हो
और इसी कसौटी पर ही
नायिका सूत्रधार बनी रहेगी
मेरी हर रचना में
अपनी लेखनी से
तुम्हें अमर करने की चाह
बस यूं ही
जो शाब्दीक भी नहीं, भाषीक भी नहीं!
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यायावर


आने वाली हमारी नस्लों की नकारात्मक मानसिक विपदा से सुरक्षा के लिए!

May 5, 2009
सदार नमस्कार!
मेरे भाइयों!…बहनों!
आपके सामने आपनी बात कहने का और आपकी बातों को सुनने के  सापेक्षिक अधिकार ने मुझे अपने शब्दों के साथ यहाँ लाकर खडा कर दिया है| मष्तिस्क की व्यापकता के लिये सही कसौटी पर कसे जाने वाले पहलुओं से भरा संवाद ही हमारी मानोदशा को अनुशासित कर निर्माण कार्य में हमारे अमूल्य योगदान को स्थापित कर सकता है| 
नई तकनीक और उसकी उपलब्धियां समाज के निर्माण में कैसी और कितनी भूमिका निभा सकेंगी इस बात का निर्णय उन तकनीकों को आत्मसाथ करने वाले लोगों की मानसिकता पर ही पूरी तरह से निर्भर करता है| अगर मैं भारत देश के परिप्रेक्ष्य में तकनीक के अविर्भाव की बात करूँ तो इस सन्दर्भ में यहाँ के लोगों की मानसिकता का यह शैशव काल है, एक ऐसा समय जिसमें परिणाम का बोध किए बिना ही अपनी मनमानी करने की जड़ता का स्वाभाव उनकी कुंठा की ओर संकेत करता है| इस स्थिति और परिस्थिति में उम्र के अंतिम पड़ाव को पार कर रहे हमारे बुजुर्ग हों या हमारे युवा साथी दोनों ही अपरिपक्वता का ग्रास बनतें हैं| समाज के निर्माण में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले युवाओं और बुजुर्गों को ही आज़ सबसे ज्यादा सजग और सचेत होने की ज़रूरत है| इन्टरनेट के माध्यम से ब्लॉग पर शब्दों और तस्वीरों से नकारात्मक सोच और समझ को उकेरने वालों को यह ज़रूर सोचना पडेगा की एक सभ्य इंसान कहे जाने के नाते समाज के लिए आखिरकार उनकी क्या जिम्मेदारी बनती है? इन हालातों में ना ही वे अपने बच्चों को ठीक संस्कार दे सकेंगे और ना ही समाज के निर्माण में अपनी सकारात्मक भागीदारी|
आपकी टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है, यह केवल मात्र शब्दों के हेर-फेर नहीं अपितु आपके वैचारिक चरित्र का संकल्प भी होगा की ऐसी नकारात्मक, आपत्तिजनक और आक्रामक मानसिकता  का हम आपनी सार्थकता के अनुरूप उसका समूल नष्ट करें ताकि आने वाली हमारी नस्लें इस मानसिक विपदा से सुरक्षित रह सकें|  आपकी टिप्पणिओं का सदैव सादर स्वागत है|
 
शुभकामनाओं समेत!
आपका शुभेक्षु!
“यायावर”

आपकी पहल ही समाज के सृजन की प्राथमिक इकाई है!

April 27, 2009
सादर नमस्कार!
मेरे भाइयों!…बहनों!
जो मैं आपसे कहना चाहता हूँ..इस में आपकी सहमती हो, ऐसा भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है| हाँ..आपको लगे की अमल करने योग्य है तो आपका मैं स्वागत ही करूँगा| समाज की सृजनता से जुड़ी स्वैछिक कार्यों की अपनी विशेष भूमिका को आप “एन.जी.ओ” कहते हैं जिसका हिंदी रूपांतरण देखा जाये तो “गैर-सरकारी संगठन” या फिर अंग्रेजी में “नॉन-गवर्नमेंटल ओर्गानाएजेसन” कहा जायेगा| किसी भी शब्द के आगे गैर का इस्तेमाल करने पर उसका सम्बन्ध  नकारात्मकता से जुड़ जाती है| आखिर आपकी संस्था को सरकार के द्वारा दिये  गये  उपनाम के आगे गैर जोड़ने की ज़रूरत ही क्यूँ पड़ी? इसका मुख्य कारण मुझे यही समझ आता है कि सरकार या यूँ कह लें की राजनैतिक पार्टी की सत्ता नहीं चाहती की आपकी छवि जनता के बीच उनसे ज्यादा अपना विश्वास जमा पाये| यह सत्ता की सरकार या फिर राजनीतिक दलों  की  सोची-समझी एक ओछी महत्त्वाकांक्षा है, जो बिना किसी स्वार्थ के समाज के लिये किये जाने वाले सकारात्मक कार्यों के अधिनायकों की शाख को समाज में कमज़ोर साबित करना चाहती है| उन्हें अपनी लोकप्रियता पर संकट छाया नज़र आता है, उनकी अपनी असुरक्षा की भावना ही सकारात्मक कार्यों के अधिनायकों को गैर साबित करने पर तुली रहती है और हम इसे  बडे तौर  पर गर्व का विषय मानकर, अपनी प्रशंसा समझ कर  फूले नहीं समाते हैं|
सच बोलूं, तो सकारात्मक कार्यों के अधिनायक अपनी स्वेच्छा से समाज में सृजनात्मक कार्यों को प्रतिपादित और संपादित  करते हैं| यह उनके लिये आत्मगौरव और आत्मसम्मान का विषय है| वे किसी के दबाव में आकर समाज के लिये अच्छा नहीं करते, वास्तव में वो अपने जीवन से कुछ निकाल कर समाज के निर्माण में अपनी जिम्मेदारी को स्थापित करतें है या ऐसा करने की इच्छा रखते हैं | उनकी यह स्वेच्छा की भावना ही उनकी रूचि बन जाती है जो समाज के निर्माण में नींव का काम करती है|
मेरा यही कहना है आपसे की आप अपने आपको “गैर-सरकारी संगठन” या फिर अंग्रेजी में “नॉन-गवर्नमेंटल ओर्गानाएजेसन”  न कहें| सकारात्मक कार्यों के अधिनायक अपनी स्वेच्छा से समाज के निर्माण में नींव की स्थापित करते हैं इसलिये वे स्वैछिक हैं|  मुझे लगता है की “एन.जी.ओ” या “गैर-सरकारी संगठन” के स्थान पर “स्वैछिक संगठन” या “वोलुन्ट्री ओर्गानाएजेसन” कहना  ज्यादा व्यापक और उचित होगा|
हमारी भाव-व्यंजना जैसी होगी कार्य का व्यवहार भी वैसा ही होगा| मेरी बातों से आपकी सहमती या असहमती पर प्रभाव पडे न पडे इससे मुझे कोई गुरेज़  नहीं लेकिन आपकी भाव-व्यंजना से मुझे समाज में सकारात्मक कार्यों  की अपेक्षा अवश्य होगी| इस सम्बन्ध में आप जो विचार मेरे समक्ष रखेंगे, मैं  उसका हृदय से स्वागत करूँगा, आप अपने विचारों के साथ सदैव आमंत्रित हैं| आपकी पहल ही समाज के सृजन की प्राथमिक इकाई है|
अपना ख्याल रखें|
शुभकामनाओं समेत!
आपका शुभेक्षु!
“यायावर”

आखिर यह प्रश्न किसके सामने रखा जाये..कि वह जायज क्यूँ नहीं?

April 21, 2009
मैंने उसके सर पर हाथ फेरा…उसकी आँखों से आंसू निकल पड़े! जैसे मुझसे वह पूछ रहा हो…”क्या कसूर है मेरा?” न जाने सवालों की ऐसी ही कितनी लडिओं से उसकी आँखें सराबोर! मैं अवाक्-सा रह गया..क्यूंकि मेरे पास कोई प्रतिउत्तर  नहीं था| मेरा आत्मसम्मान  ग्लानि  में विलीन  होता चला गया लेकिन  उस वक़्त मैं व्यक्तिगत  नहीं था|
मैं बस स्टैंड से अपने घर की तरफ तेज़ क़दमों से आगे बढ़ रहा था कि अचानक किसी ने मेरी ऊँगली पकड़ ली| पीछे  मुड़कर देखा एक छोटा-सा  बच्चा था| जिसकी उम्र लगभग पॉँच वर्ष की होगी…एकदम  काला-कलुठा…बाल बिखरे हुए|…उसने केवल एक हाफ-पैंट पहन रखी थी  वह भी फटीचिटी!..उसे देखते ही मैं बिदक गया…उसका हाथ झटकते  हुए कहा “भाग यहाँ से!”
अब मैं और भी तेज़ क़दमों से घर की तरफ बढ़ने लगा यह सोचकर कि कहीं वह दुबारा न मेरे सामने आ धमके| लेकिन उसका चेहरा बार-बार मेरी आँखों के सामने तैर रहा था…ऐसा लग रहा था मानो जैसे… किसी ने मेरे पैर कसकर जकड़ लिए हों| मैं अपने कुलीन संस्कारों की रक्षा में क़दमों को तेजी से बढ़ाने के क्रम में प्रयासरत था लेकिन वहीँ दूसरी तरफ समाज से बहिष्कृत उसी के संस्कार के एक अन्य पहलू ने मुझे आगे नहीं बढ़ने दिया| कुछ देर तक मैं चुपचाप खड़ा..ये सोचता रहा ….”क्या करूँ?”
मैंने उससे पूछा -“क्या नाम है तेरा?”
“नाजाज़!”
“किसने रखा तेरा ये नाम?”
“नहीं मालूम! सब यही कहते हैं|”
उसके ज़वाब मैं किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं थी|
“तेरे माँ-बाप?”
“नहीं मालूम!”
उसके इस ज़वाब ने मेरे अन्दर विषाद घोल दिया, लेकिन उसके इस ज़वाब में उसकी अपनी पहचान झलक रही थी| समाज की सच्ची सूरत बनकर…!
“भूख लगी है तुझे?”
“हाँ!”
“क्या खाएगा?”
“रोटी!”
“फिर क्या करेगा?”
“कुछ भी नहीं!”
उसे लेकर मैं एक होटल में गया| देखते ही होटलवाले  ने कहा -“खामखा परेशान होते हो बाबूजी! ये तो इनका रोज़ का काम है…. किसी न किसी साहब को  रोज़ पकड़ लाते हैं और उनसे पैसे खर्च कराते हैं|”
मैंने हंसते हुए कहा -“इसमें फायदा भी तो तुम्हारा ही होता है ना, तुम्हें  तो खुश होना चाहिये|”
मैंने पूछा -“क्या तुम इसे जानते हो?”
“बाबूजी! खूब अच्छी तरह से जानता हूँ इसे…है स्साला किसी की नाजायज औलाद! यहीं पड़ा रहता है…ना माँ-बाप का पता और ना घर का ठिकाना!”
उसकी इस बोली को सुनकर मेरा मन हुआ की उसे कस कर दो झापड़ रसीद करूँ…डांटते हुए उसे चुप रहने को कहा| वह चुपचाप अपने काम में लग गया…थोड़ी ही देर में बच्चे के हाँथ में खाने को कुछ देते हुए कहने लगा -“क्यूँ गुस्सा होते हो बाबूजी! चाहे जो भी हो..सच्ची बात तो यही है ना!”
उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए मैंने कहा- “हाँ! यही है…हमारे अपने समाज की सच्चाई!”
मैं उस बच्चे को वही छोड़ कर घर चला आया, लेकिन उस बच्चे के लिये समाज का ऐसा रवैया…मुझे कचोट रहा  था| मेरा अंतर्मन प्रश्नों के द्वंदों की रस्सा-कस्सी से जूझ रहा था| कैसा समाज है हमारा? भावनाओं, संवेदनाओं को ताख पर रखकर एक नन्हीं-सी जान को मरने के लिये फेंक देते हैं हम…कभी सड़क पर!…कभी कूडे के ढेर पर!…क्या जीवन का अस्तित्व इतना ही समझ पाने में हम सक्षम हैं?..इस सक्षमता में कहीं न कहीं अपने दामन पर लगनेवाले दाग को छुपाने की समझ है! … हाँ!…अवश्य ही विवश करता है हमें  हमारा मान-सम्मान, प्रतिष्ठा और कुल मर्यादा! ऐसा ही होता है …खोखले समाज की रखैल आडम्बरों के मान-प्रतिष्ठा की रक्षा में!
मासूम चेहरा…! अधखुली आँखें…! छोटे-छोटे कोमल हाँथ-पैर…! बंद मुट्ठी…!
बंद मुट्ठी…! से फिर भी छिनते  हैं हम…उस मासूम का बचपन..उसकी जायज पहचान|  एक असहाय की मज़बूरी का कितना गैरजिम्मेदार होकर  लाभ उठाते हैं हम…क्यूंकि वो मासूम चिलाकर या लड़कर हमें रोक नहीं सकता…अपने हक के लिये! आखिर यह प्रश्न किसके सामने रखा जाये..कि वह जायज क्यूँ नहीं? समाज के सामने या उस मासूम के सामने…!

विषयांतर होने की बात!

April 12, 2009

सोच के परिदृश्य को मुखरित करना एकांतवास की यायावरी है| सोच की गलियों से भटकते-भटकते हम किसी नुक्कड़ या चौराहे पर ठहरकर थोड़ी देर के लिये अपनापन महसूस करते हैं…जहाँ से एक सिलसिला शुरू होता है स्‍वयं से अनवरत संवाद स्थापित करने का!

परत-दर-परत जिंदगी के अनसुलझे पहेलिओं में छुपकर…फिर उसे कुरेदना! है न बिलकुल अपने आप को दर्द के करीब ले जाना…..ये आदत भी नतीजतन संस्कार के स्वरूप को एकांतवास का सामीप्य देतीं हैं….बहुत कुछ पाया है मैंने…संस्कार के इस गर्भनाल में! जहाँ अट्टहास और आह दोनों ही एक सबल बांध तैयार करतीं हैं…लेकिन पहेलिओं का विप्लव बार-बार उन्हें तोड़ता है…और जैसे जिंदगी के फेहरिस्त में भूचाल-सा संक्रमण एक-एक कर सारे हदों को पार करता चला जा रहा हो| मेरी इस दयनीयता पर कटाक्ष करते हुए किसी ने अपनी प्रतिक्रिया मढ़ दी कि यह मेरी अकर्मण्यता है, जो मुझे उबरने नहीं देती इन हालातों से…जो इस भौतिक युग में महज़ विषयांतर होने की बात-भर है|

भौतिक सुखों से विषयांतर होकर हम वस्तुनिष्ठ जीवन तो जी सकते हैं, किन्तु भावनात्मक सुख से विषयांतर होने पर तो मात्र आवेग और द्रोह जैसी धारायें हमारे जीवन के किनारों से टकराती रहेंगी…और यह पर्याय भी हमें साँसों के ओह-पोह में घुटते रहने के लिये मात्र छोड़ देगा…!

मैं नहीं जनता हूँ…और न ही जान पाता हूँ…क्या कुछ मुझे चाहिये…जिससे मेरा यह भ्रम खंडित हो जाए| संभवतः इस भ्रम का खंडित होना ही जीवनपाश चक्र से मुक्त होना तो नहीं….!

थिरकते स्याहों में,
मेरे कुछ ज़ज्बात फूटे!
कागज़ के टुकड़ों पर,
मेरे कुछ हालात टूटे!


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