स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

स्वप्न के इस नीर में आकाश कितना!
है तिमिर को साधता प्रकाश कितना!

सुप्त कण के जागरण में तुम जुटे जब,
चेतना के अंक का आभास कितना!
हो रही है धूंध अपने ही गहर में
दिप्त होते बिम्ब में अवकाश कितना!
स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

स्याह-सा कुछ आवरण में कुढ़ता क्यों?
पथ से पथिक के मोह की मूढ़ता क्यों?
परिणाम के परिपथ में पिसता विश्वास कितना!
स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

पसरे हुए निर्वात में निमित्त समेटे,
बाती विधि की जल रही सबकुछ लपेटे।
जो जल रहा उसका है प्रवास कितना!
स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

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3 Responses to स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

  1. chakreshblog says:

    aap ki kavita padhne ke liye aaj office ke saare kaam nibta ke baitha hun….aap ki kavitaaoN mein alag hi prakaash hai … gehare sawaal, sundar bhaav aur ek sangarsh maanav ka….bahut bahut badhaai achchhi kavita ke liye.

    abhaar,
    Chakresh Singh

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  2. चक्रेश जी…सादर नमस्कार!
    आपका बहुत बहुत ध्न्यवाद……बहुत खूब मन गद-गद हो गया।

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  3. anup says:

    बहुत खूब अनुराग जी

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