विवश शब्द को ऋण कर दो!

पत्थरों का प्राण कहता,
युग भी निर्माण कहता|
कपकपाते होंठ कहतें,
पोंछ दो आंसू जो बहतें|

जीर्ण-जीर्ण को तृण कर दो,
विवश शब्द को ऋण कर दो|
आगमन में दसों दिशाएँ,
देख तुमको मुस्कुराएँ|
फिर बसंती वात बहती,
कूक कोयल क्या न कहती?
समझने की फेर कैसी?
समझ लो तो देर कैसी?
बंधनों पर प्रहार कर दो,
हर दिवस त्योहार कर दो|

अम्बर का आनन् न सूना,
अभी तुम्हें अम्बर है छूना|
ओज का तू दर्श कर ले,
दर्द का स्पर्श कर ले|
आस्था की मूर्तियों में,
तू मूर्तियों की आस्था है|
तू नहीं कुछ जानता है,
तू क्यूँ ऐसा मानता है?

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14 Responses to विवश शब्द को ऋण कर दो!

  1. अति उत्तम! क्या कहूँ? शब्द कम पर जाता है.

    कविता पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे एक यायावर एक भटके राही को राह दिखाने का पर्यत्न कर रहा है. ठीक वैसे ही जैसे असीम सागर करता है भूले नाविक का आह्वान।

    rgds.

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  2. मुक्त गगन में विचरण कर यह
    तारों में फिर मिल जायेगा,
    मेघों से रँग औ’ किरणों से
    दीप्ति लिए भू पर आयेगा।
    स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प
    भूमि को सिखलायेगा।
    …यायावर राह दिखाएगा…

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  3. अति सुन्दर!!

    ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
    प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
    पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
    गले लगा लो यार, चलो हम होली खेलें.

    आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

    -समीर लाल ’समीर’

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  4. singhanita says:

    सुंदर रचना …
    किन्तु भाव की तरलता और बेहतर हो सकती थी (सविनय)

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  5. So my dearYayawar
    I notice a marked change of course in the flow of your emotions stream.they are diverting towards a serene stability.Somewhere I read you in between the lines,saying to your past these words “तुमसे एक संवाद करने की इच्छा होती है! “So my dear friend” no need to have any dialogue with past.Past gets pleasent when it is passed!और एक बात और yayawar is a travellor of miles where many rivers emerge and parish!As the river parishes it takes a shape of a rough path so stop this संवाद and ebrace your present road which is so smooth and shall lead you to success.Sorry for harsh but realistic observations
    Dr Vishwas Saxena

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  6. I forgot to tell one more thing your words are never ever dependent on any bodies sympathy ,you are mighty Yayawar.I never like you getting weak.If ever it will happen,I shall appear to evoke you.
    Dr Vishwas Saxena

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  7. manjoo says:

    अम्बर का आनन् न सूना,
    अभी तुम्हें अम्बर है छूना|
    ओज का तू दर्श कर ले,
    दर्द का स्पर्श कर ले|
    आस्था की मूर्तियों में,
    तू मूर्तियों की आस्था है|
    तू नहीं कुछ जानता है,
    तू क्यूँ ऐसा मानता है?
    ……….. अति सुंदर रचना

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  8. dimple says:

    उत्साह जगती एक कविता ….जोश भारती एक कविता……..जो निराश हताश जिन्दगी को नए पंख दे उड़ने को मजबूर कर दे….

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  9. Ravi Rajbhar says:

    Bahut sunder …..jitani tarif kijaye kam hai
    aapki kalam se milkar ….dil bahut khus huwa!

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  10. Ati sunder rachna.

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  11. Avinash says:

    Aapko to kauch kahna hi prabhakar ko deep dikhana hai 🙂

    lekhni achal rahe..yahi kamna hai

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  12. Hemant says:

    Sabdon ka aisa sangrah aur unka taal mail acha lagta hai…

    2 sabd –

    ~: tumhare Bin Chup Chup Rehna Ab Acha Lagta Hay
    ~: Khamoshi Se Ek Dard Ko Sehna Acha Lagta Hay
    ~: Jis Hasti Ki Yaad Me Aansoo Baraste Hain
    ~: Saamne Us Ke Kuch Na Kehna Acha Lagta Hay
    ~: Mil Kar Us Se Bichar Na Jaun Darta Rahta Hoon
    ~: Is Liye Bas Door Hi Rehna Acha Lagta Hay

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  13. seowebkey says:

    Nice Blog its amazing:——keep it up sir ji

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  14. zalata says:

    very good dear………..

    its very nice yaar 🙂

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