मृत्यु! आत्मा का अज्ञातवास!

दंभ निमित में मृगतृष्णा के,
गहन-सघन स्वांस अभ्यास|
पुनः व्यंजित वृत्त-पथ पर,
आत्मा का पुनरुक्ति प्रवास|
कल्प-कामना के अनंत में,
लिपिबद्ध अपूर्ण उच्छास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है, जीवनवास|

अवतरण का,
सत्य, मिथक क्या?
यह भ्रम, मन का,
पूर्वाग्रह है|
ज्ञात यही,
अवसर-प्रतिउत्तर|
जिस काया में,
बसता मन है|
पूर्वजन्म की स्मृति शेष,
ज्यौं पुनः न करती देह-अवशेष|
किंचित यह भी ज्ञात नहीं,
तब क्या था?
क्यूँ जीवन पाने का धर्म है?
पूर्व जन्म का दंड मिला,
या
यह अगले जन्म का दंड-कर्म है|
सत्य का संधान न पाकर,
निर्वात उकेरता एकांतवास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है, जीवनवास|

लिप्त कर्म में,
दीप्त कर्म में,
संचित धर्म,
निर्लिप्त आयाम|
कैसा दर्पण श्लेष दृष्टि का?
भूत-भविष्य का कैसा विन्यास?
क्यूँ भ्रम को स्थापित करते?
खंडित कर दो सारे न्यास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है जीवनवास|

जो निश्चय था,
तुम्हारे मन का|
पूर्ण से पहले,
वह अविचल है|
जो लिया यहीं से,
देकर जाओ|
यही कर्म है,
यहीं पर फल है|
त्याग-प्राप्ति संकल्प तुम्हारा,
है, तर्कविहीन तुष्टि का सन्यास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है जीवनवास|

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5 Responses to मृत्यु! आत्मा का अज्ञातवास!

  1. Asit Sahu says:

    Have you read आत्मा का घट परिवर्तन (Many Mansions) by Gina Cerminer.
    Your blog appeared when I googled “आत्मा का घट परिवर्तन”.

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  2. Bahut achhi kavita hai! Sach kahun to zeevan marta hai per aatma amar hai, wo kabhi nahi marti. Mera aisa manna hai. Banki bhagwan jane sach kya hai.

    बनाकर अपनी दुनिया को उसे बर्दाश्त भी करना
    ख़ुदा मेरे, मैं तेरे हौसले की दाद देता हूँ

    परिंदे ने कहा तू क़ैद रख या कर रिहा मुझको
    मैं अपनी ज़िन्दगी का हक़ तुझे, सैयाद देता हूँ

    मैं दुःख से घिर गया तो गैब से आवाज़ ये आई
    सुखों की छाँव मैं अक्सर दुखों के बाद देता हूँ

    तेरी यादों के पंछी जिस चमन में चहचहाते हैं
    लहू से सींच कर उसको वफ़ा की खाद देता हूँ

    बिना मर्ज़ी के उसकी कुछ नहीं होता ज़माने में
    ये कहकर खामियाँ अपनी ख़ुदा पर लाद देता हूँ

    -दीपक गुप्ता

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  3. shahroz says:

    इस लय-विरोधी समय में जब जीवन से भी लय-ताल लुप्त होता जा रहा है, आपकी कवितायें आश्वस्ति देती हैं.

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  4. shahroz says:

    मन जितना विचरा घट-घट में, समझो उतने तीरथ कर धाये! क्या मंदिर? मस्जिद, क्या गिरजा? यह सब तुमने व्यर्थ बनाये!!
    बहुत खूब!

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  5. drvishwassaxena says:

    hello Yayawar
    my favorite matnee icon devanand in one of his public address said who knows death may be a romance so be it so!I appreciate your comparison of dead state into exile of soul!we breath a unit air from the alms of life given from the almighty only yayawar can but revive even a carcass by the sensuality of his poems and soul may again escape exile and rejuvenate life in a dead person too,So keep on writing.ALL the other things would continue to happen.love
    Dr Vishwas

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