अभी नहीं करता तुम्हें, अंतिम प्रणाम!

श्वे़त  पर ज्यों,
श्याम बिखरें हैं,
यथावत!
श्लेष भावों के वरण में,
अन्तः का प्रकल्प लेकर|
नित्य प्रतिदिन,
मृत्यु करती है आलिंगन,
पुनर्जीवन के दंभ का संकल्प लेकर|
 
अट्टहास-सा क्रंदन समेटे,
बाहु-पाश में|
अलिप्त-सा,
अब लिप्त क्यूँ?
किसी अप्रयास में|
 
है विधि का चक्र ज्यों,
होना निष्प्राण|
श्रेष्ठ यही,
विष्मृत  न हो, 
जीवन-प्रमाण|
 
माध्य हूँ मैं कर्म का,
कर्त्तव्य-पथ पर|
गंतव्य से पहले मेरा,
वर्जित विश्राम|
 
हे मृत्यु! तू ही ले,
अपनी गति को थाम|
अभी नहीं करता तुम्हें,
अंतिम प्रणाम!
 
मोक्ष नहीं कि,
तू मिले,
अनायास मुझको|
सोच यह कि काल ने,
निगला मुझे है|
ग्रास हूँ मैं वक्र-सा,
सहज नहीं हूँ,
सृजन-बीज हूँ,
काल से डरता नहीं मैं|
 
तेरी अपनी पीड़ा,
तेरी अपनी हार का|
मैं तो रहा सदा वंचित,
तेरे अनगिन प्रहार का|
याचक नहीं कि स्वार्थवश,
बनूँ प्रार्थी!
क्यूंकि है अन्तरिक्ष स्वयं,
मेरा सारथी!
 
हे मृत्यु! तू ही ले,
अपनी गति को थाम|
अभी नहीं करता तुम्हें,
अंतिम प्रणाम!
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5 Responses to अभी नहीं करता तुम्हें, अंतिम प्रणाम!

  1. anil kant says:

    आपकी रचना ने बहुत प्रभावित किया…आपको मेरा सलाम

    Like

  2. माध्य हूँ मैं कर्म का,
    कर्त्तव्य-पथ पर|
    गंतव्य से पहले मेरा,
    वर्जित विश्राम|

    वाह !!! आपकी इस रचना में जो शक्ति और उर्जा है,यदि कोई इसे अंतर से अनुभूत करे तो कर्म और जीवन से गहरे जुड़े बिना न रह पायेगा…

    बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर रचना….मुग्ध कर लिया इसने….बहुत बहुत आभार आपका ….

    Like

  3. हे मृत्यु! तू ही ले,
    अपनी गति को थाम|
    अभी नहीं करता तुम्हें,
    अंतिम प्रणाम!

    -बहुत बेहतरीन रचना.

    Like

  4. Rewa Smriti says:

    “तेरी अपनी पीड़ा,
    तेरी अपनी हार का|
    मैं तो रहा सदा वंचित,
    तेरे अनगिन प्रहार का|
    याचक नहीं कि स्वार्थवश,
    बनूँ प्रार्थी!
    क्यूंकि है अन्तरिक्ष स्वयं,
    मेरा सारथी!”

    Aapki poem bahut achhi hai. Mujhe ye panktiyan kafi achhi lagi. Ek rachna barbas yaad aa gayi, yahan daal rahi hun.

    rgds.

    यह न सोचो कल क्या हो
    कौन कहे इस पल क्या हो

    रोओ मत, न रोने दो
    ऐसी भी जल-थल क्या हो

    बहती नदी की बांधे बांध
    चुल्लू मे हलचल क्या हो

    हर छन हो जब आस बना
    हर छन फ़िर निर्बल क्या हो

    रात ही गर चुपचाप मिले
    सुबह फ़िर चंचल क्या हो

    आज ही आज की कहें-सुने
    क्यो सोचे कल, कल क्या हो

    रचनाकार: मीना कुमारी

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  5. Ok Yayawar
    a war cry in your lines is very conspiciously visible!And why not What is the might of death to behold a stormy rider of life,YAYAWAR!I am exteremly happy to see this incarnation of yours.So AAAAAAkrman!attack the death to immortalize life—!Very good poem yayawar.love
    Dr vishwas Saxena

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