देवत्त्व का वरदान बनने!

तुम प्रसस्ति  हो पिता के,
तुम प्रसस्ति  के पिता हो|
 
है तेरा पदचाप अनुगम,
अनुपालक की तू शिला है|
अनवरत है चक्र जीवन,
जिसकी विधि पर तू खिला है|
 
सुनो!
समस्त स्वप्न है ये,
टूटना अनिवार्य जिसका|
किन्तु कर्त्तव्य पथ के अधर पर,
पुनः पुनः है कार्य जिसका|
 
तू भी चल!
मैं भी चलूँगा!
समस्त का निर्माण करने |
पथ सृजन से पथ गमन तक,
देवत्त्व का वरदान बनने!
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2 Responses to देवत्त्व का वरदान बनने!

  1. प्रिये अनुराग
    तुम्हारी एक और उत्कृष्ट कविता पढ़ी , और बोध हूआ की तुम वास्तव में काव्य की ऊँचाई प्राप्त कर चुके हो .सतत ऐसे ही लिखते रहो ———-इस कामना के साथ
    डॉ विश्वास सक्सेना

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  2. ram krishan says:

    No waords to even appriciate….
    Maa Saraswati has bestowed upon u the gift of using ur words powerfully….
    God Bless & best of luck, Sir….

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