आने वाली हमारी नस्लों की नकारात्मक मानसिक विपदा से सुरक्षा के लिए!

सदार नमस्कार!
मेरे भाइयों!…बहनों!
आपके सामने आपनी बात कहने का और आपकी बातों को सुनने के  सापेक्षिक अधिकार ने मुझे अपने शब्दों के साथ यहाँ लाकर खडा कर दिया है| मष्तिस्क की व्यापकता के लिये सही कसौटी पर कसे जाने वाले पहलुओं से भरा संवाद ही हमारी मानोदशा को अनुशासित कर निर्माण कार्य में हमारे अमूल्य योगदान को स्थापित कर सकता है| 
नई तकनीक और उसकी उपलब्धियां समाज के निर्माण में कैसी और कितनी भूमिका निभा सकेंगी इस बात का निर्णय उन तकनीकों को आत्मसाथ करने वाले लोगों की मानसिकता पर ही पूरी तरह से निर्भर करता है| अगर मैं भारत देश के परिप्रेक्ष्य में तकनीक के अविर्भाव की बात करूँ तो इस सन्दर्भ में यहाँ के लोगों की मानसिकता का यह शैशव काल है, एक ऐसा समय जिसमें परिणाम का बोध किए बिना ही अपनी मनमानी करने की जड़ता का स्वाभाव उनकी कुंठा की ओर संकेत करता है| इस स्थिति और परिस्थिति में उम्र के अंतिम पड़ाव को पार कर रहे हमारे बुजुर्ग हों या हमारे युवा साथी दोनों ही अपरिपक्वता का ग्रास बनतें हैं| समाज के निर्माण में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले युवाओं और बुजुर्गों को ही आज़ सबसे ज्यादा सजग और सचेत होने की ज़रूरत है| इन्टरनेट के माध्यम से ब्लॉग पर शब्दों और तस्वीरों से नकारात्मक सोच और समझ को उकेरने वालों को यह ज़रूर सोचना पडेगा की एक सभ्य इंसान कहे जाने के नाते समाज के लिए आखिरकार उनकी क्या जिम्मेदारी बनती है? इन हालातों में ना ही वे अपने बच्चों को ठीक संस्कार दे सकेंगे और ना ही समाज के निर्माण में अपनी सकारात्मक भागीदारी|
आपकी टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है, यह केवल मात्र शब्दों के हेर-फेर नहीं अपितु आपके वैचारिक चरित्र का संकल्प भी होगा की ऐसी नकारात्मक, आपत्तिजनक और आक्रामक मानसिकता  का हम आपनी सार्थकता के अनुरूप उसका समूल नष्ट करें ताकि आने वाली हमारी नस्लें इस मानसिक विपदा से सुरक्षित रह सकें|  आपकी टिप्पणिओं का सदैव सादर स्वागत है|
 
शुभकामनाओं समेत!
आपका शुभेक्षु!
“यायावर”
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8 Responses to आने वाली हमारी नस्लों की नकारात्मक मानसिक विपदा से सुरक्षा के लिए!

  1. आपके कहे का ध्यान रखने की कोशिश रहेगी।
    घुघूती बासूती

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  2. madhav chandra says:

    priya bhai sahab..aapki uprokt likhit baaten padhin..mujhe samajh me aayin bhi …lekin ..ye meri ichaa hai ki agar inhi baaton ko aap aam bhasa me likhen..klist shabdon ka pryog na kar ke likheen to behatar hoga ..q ki hum aap aur kuch hin log hain jo aapke is vichaar ko samajh sakten hain..ek aam vayakti nahi…..isliye kosis karen ki aapke ye samwaad sablogon ke pathan yogay ho…..
    aapka apna
    madhav

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  3. Alok says:

    padh ke kaafi achcha laga.
    aapki baato se poorntah sahmat hoon. eske liye mai apne star se poori koshish karunga.
    Bhaiya, aap ke likhane ki shailee bahut hi utkrisht hai.

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  4. Dr Vishwas Saxena says:

    dear anurag
    I appreciate your urge to expect maturity from responders of this site.i also agree that comments must don an attier of matured dignity.But i wish say something very candidly that blind appreciation is also a type of negativity.If a person extracts some follies in the composition than rest assure he has given a considerable time to your compositions and expects you to best.If such preparedness exist then only poets must attempt to write on this site.Regards.
    Dr Vishwas Saxena

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  5. Piyush Sharma says:

    bhaiya pranam,
    aap ki is samvad se mai puri tarah sahamat hun, par mai ye bhi samajhta hun ki ye aparipakwata sirf bhartiyon me hi nahi apitu vikasit deshon me bhi hai .kyon ki yah ek mansik sthiti hai jahan nakaratmak awam skaratmak saktiyan paraspar yudh karti hain aur isme ichha ke bal par koi na koi sakti manushya par prabhavi hoti hi hai.yadi hum samaj ki bat karen to wah nirantar aapna swarup badal rha hai jisse we aapne kartawyon ko bhi badalne ki kosis karta hai.. par aap jaise path pradarshak aapni kalam se is samaj ko satya ka bodh karane me sakchham hain aur rhenge , aaise marg darshan ke liye aap ko koti-koti shadhuwad

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  6. padmsingh says:

    हे यायावर … एक पहर को ठहर तो… पूछ अपना नाम … पयाम सुन अपने अंतरतम का …

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  7. NeeraJ LohaN says:

    bhai saab kuch samajh me nahi aya….
    please help me kon si नकारात्मक मानसिक विपदा ki aap baat kr rahe hain
    aur haan 1 aur bat
    meri hindi aap ki hindi jaisi uttam to nahi kintu mere khyaal se “नस्लों ” k sthan par yadi aap peedhi ka prayog krte to behtar hota
    nayi peedhi, aane wali peedhi… not नस्ल, नस्ल is not an appropriate word

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  8. आपकी प्रतिक्रिया पढ़ी,,,संशय की भूमि पर उगे वृक्ष का फल और उस फल से प्राप्त होने वाला बीज अनुवांशिक तौर पर गुण की ग्राह्यता को नहीं त्यागता| पीढ़ी एक सामूहिक संदर्श है किन्तु नस्ल एक विशेष फल की भांति है जिसकी एकल पृठभूमि होती है| नस्ल को सुधारने का सामर्थ्य हम जुटा सकतें हैं किन्तु पीढ़ी को सुधारने का सामर्थ्य केवल मात्र परम्परा और दायित्व के ही अधीन है| नस्ल सबसे पहले परम्परा और दायित्व का धरोहर पीढ़ी को सौंपती है बाद में यही उसकी अनुवांशिक ग्राह्यता बनकर समाज के गुणों का वृतचित्र गढ़ती है| उसके इस गुण के फलस्वरूप ही हम परिणाम के आचरण से उसके नकारात्मक या सकारात्मक पहलू को चिन्हित करते हैं| जैसे जहर का परिणाम उसके प्रयोग पर निर्भर करता है| अगर मानसिकता नकारात्मक हुई तो उसका प्रयोग किसी की मृत्यु के लिए किया जाएगा और वहीँ दूसरी तरफ मानसिकता सकारात्मक हुई तो उसका प्रयोग मृत्यु से रक्षा के लिए किया जाएगा| सुलझे शब्दों में कहूँ तो मानसिक विपदा का अर्थ है जीवन का अर्थहीनता से गहराता सामीप्य|

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