तुम निर्गुण के निर्माण हो!

हे! नवयुग के नवदीपक!
तुम नवयुग के अभिमान हो!
सम्मान हो!
वर्तमान हो!
तुम ही चिर महान हो!
तुम पौरुषता के पुंज हो!
स्वयं अपनी पहचान हो!

क्षण-भंगुर नहीं प्रसस्ति तुम्हारी,
तुम श्रृष्टि के अस्तित्व समान हो|
हे मृतुन्जय!
हे धनञ्जय!
तुम चिर रत्न के प्राण हो|
क्यूँ टूटे तेरा संबल,
तुम धैर्यवान! कृपा-मुस्कान हो!
नहीं अभेद कोई लक्ष्य तेरा,
तुम स्वयं अर्जुन की बाण हो!

हे! सर्वश्रेष्ट कृति धरा के,
तुम सर्वगुण सम्पन्न संज्ञान हो!
परिचय ते़रा! तुम में क्या अवगुण?
तुम तो निर्गुण के निर्माण हो!

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6 Responses to तुम निर्गुण के निर्माण हो!

  1. Rakesh Kumar says:

    superb..

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  2. Piyush Sharma says:

    bhaiya aap ne hume hamari pahachan kara di .
    aur nishkam karm ki shichha bhi de di..
    dhanya ho … prabhu

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  3. Dr Vishwas Saxena says:

    Dear anurag
    Please accept my congratulationsss on such a stiumlating,motivating and action linked composition of yours.You have crossed a level where every appreciation seems to be little for your many folded excellence of your poetry.Regards
    Dr Vishwas Saxena

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  4. सुनील शर्मा says:

    नमस्कार यायावर जी 🙂
    यथा हिंदी देवनागरी के अतिरिक्त किसी और लिपि में अछि नहीं लगती तथा यदि कुछ इसमें व्याकरणात्मक त्रुटियां हो तो भी उसकी शोभा कम हो जाती है
    कुछ शब्द हिंदी व्याकरण सम्मत नहीं है कृपया इनमे संशोधन करें
    प्रसस्ति श्रृष्टि मृतुन्जय

    परन्तु निस्संदेह आपकी कविता बहुत ही प्रभावशाली है विशेषतः युवा पीढी के लिए
    हमेशा ऐसे ही साहित्य सृजन करते रहिये

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  5. सुनील शर्मा says:

    खैर मैं आपको बताने चला था बाद में खुद की टिप्पणी दखी उसमे ही त्रुटियां मिल गयी 🙂

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  6. सुनील शर्मा says:

    खैर मैं आपको बताने चला था बाद में खुद की टिप्पणी देखी उसमे ही त्रुटियां मिल गयी 🙂

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