क्या हुआ है? ये परिवर्तन!

बीच अधर में टंगी,
मेरे विचारों की अस्थि,
ठीक उसी ठुठे पेड़ की तरह,
जो सिंचित होता रहा,
जब तक उपजाऊ थी धरती|
वर्षा की बूंदें स्वभावत:,
श्रृंगार परंपरा की|
पर परिवर्तन का बादल,
क्या इतना घनघोर?
जो क्षितिज की परिधि को,
परिभ्रमित कर दे|

नहीं! नहीं चाहते हम,
अस्थि बनने देना अपने विचारों को,
जो मलबे के ढेर तले दबी,
करती है सिंचित भौतिकता को,
भाउकता को नहीं|

क्या हुआ है? ये परिवर्तन!
कि भूख लगने पर,
चबाएं हो हमने,
ईंट और पत्थर|
दर्द के स्पर्श से,
खिलखिलाया हो हमारा चेहरा,
या फिर जान फूंकते देते हों हम,
हर पथराई लाशों में|
फिर क्या गंतव्य है?
परिवर्तन का|
क्या इतना ही,
कि जीवन को,
जीने की समझ परे रख,
इस कशमकश में,
कि चादर से,
बाहर पैर पसारो!

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2 Responses to क्या हुआ है? ये परिवर्तन!

  1. Dr Vishwas Saxena says:

    dear anurag
    A fantastic composition.Remeber an another change shall be witnessed by you,those who have turned your feelings into a dried stump of tree shall lament and shall belong to none,And you,you will soon witness proliferation of young green leaves and fruits as a result of your fighting endurance and selfless patience.I have just now written a poem for you only:
    सतत ताप
    तुम्हारे बदलते रिश्तों के ताप से भले ही मेरा
    हरा भरा पत्तों का छत्र जल गया हो लेकिन
    मेरे स्थायित्व का प्रतिक यह ठूठ अडिग खडा है
    और झेल रहा है तुम्हारी विशाली हवा के थपेडे
    तुम्हारा बदलाव तो तुम्हें ही गला रहा है
    अरे यह बूँद कहाँ से आयी है
    समझा तुम वजूद को अपना तुमने मृगतृष्णा ही अपने है
    तो तुम भटको इस जीवन में बराबर परिवर्तन की प्रतिक बनकर
    और में तुम्हारी दी अग्नि के धुएं को ही बदल बनाकर जल गिराऊंगा
    और इस जल से पूनः तित हो जाऊँगा ,कल पुनः पतियाँ प्रस्फुटित होंगी
    मुझे मेरा हरित वर्ना वापस देंगी
    मेरे शाक मित्र भी हरित होंगे
    पथिक भी फिर छायित होंगे
    तुम वही मृग तृष्णा रहना
    क्योंकि तुमने लिया परिवर्तन का जप
    और मैंने पाया है सतत तप,सतत तप,——-!
    यायावर के लिए विशेष तौर पैर आज दिनक २० मई २००९ को मेरे द्वारा रचित एक काव्यात्मक भेंट
    डॉ विश्वास सक्सेना

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  2. bhai sab poetry to mast kar lete ho , by d way ye to batao ye kiska asar he -experiences of ur life or inspirations of someone special. good yar par ke laga mera ek dost duniya ko pakane nikal para he , ok keep it up , pakao khub pakao , mai v sath dunga tumhare poem apne nam se send karunga, magagines me print karwaunga. plz dont mind, etna to haq banta he tumpar.baki mere comments update hote rahenge , check karte rehna.

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