मैं गुम दस्ते जुनू, अज़ारे मुहब्बत में!

मैं गुम  दस्ते जुनू,
अज़ारे मुहब्बत में|
मौजे गुरेज़ाँ जिंदगी,
खल्वत है आपकी|
सह्व  हो गई कैफ के,
आगोश में|
ख़राबे  विरानियाँ-सा मैं,
और  हिज्र आपकी|
दिखती ता सुब्ह शबे,
माह हकीक-सी|
खुल्दे ख्याल की जहाँ में,
रुख आपकी|
मिसरे फरमाये हमने,
आँखों की नामनाकी से|
ठोकरों की तकलुफ्फ़ की खातिर,
मेरी सांसें हैं आपकी|
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3 Responses to मैं गुम दस्ते जुनू, अज़ारे मुहब्बत में!

  1. Abha says:

    ..ठोकरों की तकलुफ्फ़ की खातिर,
    मेरी सांसें हैं आपकी|

    khoobsurat..

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  2. दस्ते जुनू – पागलपन का जंगल|
    अज़ारे मुहब्बत – प्रेम रोग|
    मौजे गुरेज़ाँ – बिखरती हुई लहर|
    खल्वत – तन्हाई|
    सह्व – भूलचूक|
    कैफ – मस्ती, नशा|
    ख़राबे – खंडहर|
    हिज्र – वियोग|
    सुब्ह शबे माह – चांदनी रात|
    खुल्दे ख्याल – ख्यालों की जन्नत|
    मिसरे – कविता की पंक्तियाँ|
    नामनाकी – गीलापन|

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  3. santosh sawriya says:

    Tumhari kvita achi hai. Bhut aage bdhoge.
    tumhari yaad aati hai.

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