कुछ पेंचों-ख़म, जिन्दगी में यूँ आएं!

कुछ पेंचों-ख़म,
जिन्दगी में यूँ आएं!
कुछ बचा ही नहीं,
कि दिल कैसे बहलाएं|

कुछ तासीर तजुर्बे का,
सबब है अब भी|
कि कई बार तूफां में,
चराग हमने जलाएं|
इक मुद्दत की दीवार के साये में,
जाने कितने ख़्वाबों को हमने ढाएं|
कुछ पेंचों-ख़म,
जिन्दगी में यूँ आएं!

इक शोर-सी जिंदगी,
फिर सन्नाटे का कहर|
अनजाने शहर में,
सोचता गया मैं पहरों-पहर|
पहर के हर मोड़ पर,
जाने कैसे मकाम आएं|
कुछ पेंचों-ख़म,
जिन्दगी में यूँ आएं!

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2 Responses to कुछ पेंचों-ख़म, जिन्दगी में यूँ आएं!

  1. Abha says:

    इक शोर-सी जिंदगी,
    फिर सन्नाटे का कहर|
    अनजाने शहर में,
    सोचता गया मैं पहरों-पहर|
    पहर के हर मोड़ पर,
    जाने कैसे मकाम आएं|
    कुछ पेंचों-ख़म,
    जिन्दगी में यूँ आएं!

    hum sab ki zindagi aisa waqt kabhi na kabhi zarur hai…
    padhna achha laga..

    Like

  2. Dr Vishwas Saxena says:

    Excellent depiction yayawar
    Carry on your every deep emotion is precious to the community ,I have firm belief that any emotional ripple incured by you shall gift society a sensational poem of yours.Love
    Dr Vishwas Saxena

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