आँखों को सिमटता आसमान मिला!

मयस्सर है दर्द हमको,
हर मयखाने में|
सच ये नहीं,
नशा शाकिए पैमाने में|
शाकियों के प्यार में हमें,
मौत का सामान मिला|
आँखों को सिमटता आसमान मिला!

नहीं उल्फत का दस्तूर,
हसरतें पूरी हों दिल की|
परस्तिश जिनसे थी,
दर्दे गम को भूल जाने की|
वक़्त के तकाजों में,
जोरों का तूफ़ान मिला|
आँखों को सिमटता आसमान मिला!

गुज़ारा वक़्त बहुत हमने,
उनको भूल जाने के लिये|
किया है दफ़्न हमने साँसों को,
गम छुपाने के लिये|
भूलने के सिलसिले में,
यादों का अरमान मिला|
आँखों को सिमटता आसमान मिला!

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3 Responses to आँखों को सिमटता आसमान मिला!

  1. Abha says:

    गुज़ारा वक़्त बहुत हमने,
    उनको भूल जाने के लिये|
    किया है दफ़्न हमने साँसों को,
    गम छुपाने के लिये|
    भूलने के सिलसिले में,
    यादों का अरमान मिला|
    आँखों को सिमटता आसमान मिला!

    bahut khoob Anuraag…

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  2. sujata says:

    aapki urdu bhi kamal ki hain….hmm kafi achchi rachna ahin anurag ji

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  3. Hi, interesting post. I have been thinking about this issue,so thanks for writing. I will definitely be coming back to your posts.

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