“यायावरी”

दूर से देखता हूँ,
उस कतार को|
पाता हूँ अपने आपको भी,
किसी से आगे,
किसी के पीछे|
संभवतः यही है,
आगे बढ़ने के क्रम में “यायावरी”
सोच और समझ की|

आश्चर्य की परिभाषा,
और जिज्ञासा का मिश्रण,
इसी रसायन का,
रसास्वादन है “यायावरी”

भावनावों के चीख की रेखाएं,
जड़वत करती हैं मुझे,
और खडा कर देती है,
संदेह के कटघरे में|

पाया तो है मैंने,
भौतिक पदार्थ को,
वहीँ खो दिया है मैंने,
संबंधों के यथार्थ को|

यह पर्याय भी छणिक सी,
ह्रदय में तरंगे पैदा कर,
शांत हो जातीं धीरे-धीरे,
पुनः हावी होता मुझ पर,
व्यवसाय!

कुछ इसी प्रकार के,
तंतुओं से बुनता हूँ,
आने वाले कल को,
अपने हर पल को……….

सोचने-समझने की प्रक्रिया,
परस्पर तार्किक हो,
संभवतः तैयार करती है रूप-रेखा,
चिंतन की|
कभी-कभी नहीं तैयार कर पाते हम,
सही मापदंड,
चिंता और चिंतन की|
यही उधेड़बुन पैदा करती है असमंजस,
विचारों की पुष्टी में,
ऐसी उधेडबुन,
मस्तिष्क की व्यापकता के लिये,
साहसिक है|

कुछ इसी प्रकार के,
तंतुओं से बुनता हूँ,
आने वाले कल को,
अपने हर पल को……….

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6 Responses to “यायावरी”

  1. anil kant says:

    बहुत अच्छी रचना …मुझे बहुत पसंद आयी

    मेरी कलम – मेरी अभिव्यक्ति

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  2. gargi says:

    aap bhut acha likhte hai

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  3. Dr Vishwas Saxena says:

    dear anurag
    living with certainity amidist the uncertainity is the beauty and vanity of everyman.This idea is very nicely sketched by you in this poem of yours.You go on this way,and never loose your original but conspicous,emotional but yet very realistic,innocent yet not vulnerable self–and remember on your every stride you will find someone smiling with a strange satisfaction,it would be me—-so harness the horse of your actioned thoughts and ride the steed of success like a victorious warrior!
    again your best fan
    Dr Vishwas Saxena

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  4. बहुत बढ़िया.

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  5. संगीता पुरी says:

    सही है .. बहुत बढिया।

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  6. Abha says:

    पाया तो है मैंने,
    भौतिक पदार्थ को,
    वहीँ खो दिया है मैंने,
    संबंधों के यथार्थ को|…

    wah! kitni kadwi baat kitne sahaj lafzon me kahi hai tumne…

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