उसे जानने की यात्रा भर है!

भारहीन!
घर्षणहीन!
धातु भी नहीं!
अधातु भी नहीं!
हवा भी नहीं!
निर्वात भी नहीं!
फिर क्या परिभाषा होगी?
जिसे भाषित करने के प्रयास में,
हम लुटाना चाहते हैं,
अपने सर्वज्ञ को,
या फिर अपना सर्वज्ञ लुटा कर ही,
परिभाषाविहीन बन जाना,
उसे जानने की यात्रा भर है!
 
इस यात्रा का पड़ाव कैसा होगा?
ठहरकर एकाएक गतिमान हो जाना,
या गतिविहीन हो जाना,
या फिर जड़वत हो जाना!
 
इन भावों के अनुभव का,
अपना एक अलग सुख होगा,,
अवश्य होगा!
जो आनंदित करता है,
जब हम चीर यात्रा पर निकलते हैं|
भारहीन बनकर!
घर्षणहीन बनकर!
 
आधार की आवश्यकता तो,
किसी भौतिकता से जुड़ी है,
और भौतिकता एक आकार से,
आकार, वस्तुबोध से|
वस्तुबोध ही तू और मैं कि
परिभाषा है!
जो क्षणभंगुर पहचान की,
परिधि में,
मुझे और तुम्हें,
सिमित करती है!

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3 Responses to उसे जानने की यात्रा भर है!

  1. अच्छी कविता है.

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  2. अध्यात्म पर लिखी हुई एक श्रैष्ट रचना है।बधाई स्वीकारें।
    इस यत्रा पर निरन्तर आगे बढ़े।

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  3. Dr Vishwas Saxena says:

    Long ago I heard a ghazal

    गमे जिन्दगी का या रब न मिला कोई किनारा
    तेरी फिकरे बेकरार में तो जहाँ को छान मारा
    किसी दूर की सदा ने मुझे प्यार से पुकारा
    the essence of which was that god resides in us and we keep on searching him here and there,a distant song made me realize it resides in my heart.Bravo! yayawar! a fantastic poem coming again from your pen.
    Keep it up
    Dr Vishwas Saxena

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