विषयांतर होने की बात!

सोच के परिदृश्य को मुखरित करना एकांतवास की यायावरी है| सोच की गलियों से भटकते-भटकते हम किसी नुक्कड़ या चौराहे पर ठहरकर थोड़ी देर के लिये अपनापन महसूस करते हैं…जहाँ से एक सिलसिला शुरू होता है स्‍वयं से अनवरत संवाद स्थापित करने का!

परत-दर-परत जिंदगी के अनसुलझे पहेलिओं में छुपकर…फिर उसे कुरेदना! है न बिलकुल अपने आप को दर्द के करीब ले जाना…..ये आदत भी नतीजतन संस्कार के स्वरूप को एकांतवास का सामीप्य देतीं हैं….बहुत कुछ पाया है मैंने…संस्कार के इस गर्भनाल में! जहाँ अट्टहास और आह दोनों ही एक सबल बांध तैयार करतीं हैं…लेकिन पहेलिओं का विप्लव बार-बार उन्हें तोड़ता है…और जैसे जिंदगी के फेहरिस्त में भूचाल-सा संक्रमण एक-एक कर सारे हदों को पार करता चला जा रहा हो| मेरी इस दयनीयता पर कटाक्ष करते हुए किसी ने अपनी प्रतिक्रिया मढ़ दी कि यह मेरी अकर्मण्यता है, जो मुझे उबरने नहीं देती इन हालातों से…जो इस भौतिक युग में महज़ विषयांतर होने की बात-भर है|

भौतिक सुखों से विषयांतर होकर हम वस्तुनिष्ठ जीवन तो जी सकते हैं, किन्तु भावनात्मक सुख से विषयांतर होने पर तो मात्र आवेग और द्रोह जैसी धारायें हमारे जीवन के किनारों से टकराती रहेंगी…और यह पर्याय भी हमें साँसों के ओह-पोह में घुटते रहने के लिये मात्र छोड़ देगा…!

मैं नहीं जनता हूँ…और न ही जान पाता हूँ…क्या कुछ मुझे चाहिये…जिससे मेरा यह भ्रम खंडित हो जाए| संभवतः इस भ्रम का खंडित होना ही जीवनपाश चक्र से मुक्त होना तो नहीं….!

थिरकते स्याहों में,
मेरे कुछ ज़ज्बात फूटे!
कागज़ के टुकड़ों पर,
मेरे कुछ हालात टूटे!

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3 Responses to विषयांतर होने की बात!

  1. Turning the wheel says:

    भौतिक सुखों से विषयांतर होकर हम वस्तुनिष्ठ जीवन तो जी सकते हैं, किन्तु भावनात्मक सुख से विषयांतर होने पर तो मात्र आवेग और द्रोह जैसी धारायें हमारे जीवन के किनारों से टकराती रहेंगी…और यह पर्याय भी हमें साँसों के ओह-पोह में घुटते रहने के लिये मात्र छोड़ देगा…!

    Aur jab hame is baat ka bodh hai to fir abodh jaise khud ko bhatakne kyun dete hen?

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  2. dr vishwas saxena says:

    dear anurag
    amazingly my views coincides with yours on physical pleasures of life! I dedicate a poem to you which was written yesterday only,specially for you! may i say that you are the best spoket of this turning wheel!go through this poem written specially for you—-!
    शीर्षक —- दोस्त हमे साथ चलना होगा

    छोड़ पीछे मेरे विद्रोही योवन को
    आ पंहुचा हूँ मै गिलानी लिए
    सफल जीवन की इस अवस्था में
    पर वह विद्रोही मुझे आज भी झंजोड़
    मेरे शांत बाजुओं को दस्तक देता
    अतीत का मेरा यह विद्रोही अक्स
    कुछ अपूर्ण कार्यों की याद दिलाता है
    पर सफल जीवन का यह मोहपाश
    मुजे पुनेह निन्द्रित कर देता है
    बुलाकर अतीत को सपनो मे
    मै पूनेः सोजाता हूँ
    सपने से ऊर्जा ले मै
    व्यथित सा जागता हूँ
    ना चाह कर भी में अतीत
    से दूर भागता हूँ
    पर मैंने तुम्हे देखा है
    या यूं कहो की
    अपने ही प्रतिबिम्ब
    को ताका है
    तो आज निभाह रहा हूँ दुनिया की इस रीत को
    और तुम्हे सोंप रहा हूँ अपने इस बागी अतीत को
    थक जब में थोडा रूक जाऊं
    तो तुम मत थमना
    मेरे बागी यवन को सशक्त हथियार बनाकर
    मुक्त करना मेरे अतीत को
    कल में फिर जग तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा
    अतीत जीत कर आये मेरे इस वर्तमान का
    भविष्य के द्वार पैर में आलिंगन करूंगा
    जीतकर अतीत को पर कर वर्तमान को
    फिर मिलना होगा !
    ——दोस्त भविष्य में माय हमें साथ चलना होगा !

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  3. “…मेरी इस दयनीयता पर कटाक्ष करते हुए किसी ने अपनी प्रतिक्रिया मढ़ दी कि यह मेरी अकर्मण्यता है, जो मुझे उबरने नहीं देती इन हालातों से…जो इस भौतिक युग में महज़ विषयांतर होने की बात-भर है|…..”

    pata nahi kyun aaj kal aisa laggta hai ki “vishay” naam ki koi chhej hoti hi nahi hai….har chhej ek khokhali man gharant murat bhar hai …. aise mein kya vishay kya vishyantar ……. akela gumna aur ulljha rehna …..aur ek aapor ki alag thal rehta hun….main poochna chhahta hun ki akela kaun nahi hai aur vishay ka bodh aakhir hai kissko ? …

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