हँस पडे मुँह खोल पत्ते…!

चरमराती सुखी डाली,
छोड़ उपवन रोये पत्ते!

जब अधर पर पाँव पड़ते,
कड़-कड़ाते बोले पत्ते!

धरा धीर धर अनमने से,
रोये मन टटोल पत्ते!

चिल-चिलाती धुप तपती,
जल गये हर कोर पत्ते!

वृक्ष की अस्थि ठिठुरती,
देख मातम रोए पत्ते!

फिर पथिक है ढूंढ़ता,
विश्राम के आयाम को!

देख कर परिदृश्य पागल,
हँस पडे मुँह खोल पत्ते!

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4 Responses to हँस पडे मुँह खोल पत्ते…!

  1. Rewa Smriti says:

    “धरा धीर धर अनमने से,
    रोये मन टटोल पत्ते!

    चिल-चिलाती धुप तपती,
    जल गये हर कोर पत्ते!”

    वैसे तो मुझे पूरी कविता ही बहुत अच्छी लगी…किन्तु ये पंक्तियाँ मुझे बहुत बहुत ही अच्छी लगी. काश कोई इन सूखे पत्तों के दर्द को सही मायने में समझ पाते…

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  2. mayur says:

    पूरा पाठ शानदार है

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  3. I view another aspect of dried leaves as shown in the poem of sarveshwar dayal saxena’s poem entitled
    सूखे पीले पत्तों ने कहा
    ——–तेज गति से दौड़ रही कार की हवा पाकर सूखे पीले पत्तों ने कुछ दूर दौड़ केर कहा
    ———सुनो हम मे भी गति है,और हम मे भी जीवन है
    I dont remember the exact words but I focus on the fact that when even carcasses are ready to stand again to have a fight then why to pity on their state and spread gloom . If today they are dead then yesterday they ornamented the beauty of a lush green tree—yes they have retreated after a successful spell of their life and wish to see new leaves take up their role——–but if todays youth spend their emotions and energy on self pity then my dear friends i have to muster carcasses to face a valiant battle–
    ज़ंग मरकर नहीं मारकर जीती जाती है . यायावार्जी मैंने एक ऐसे फेन को पकडा है जो आपको तड़पता देख एक संतुष्टी पाता है. वो आपकी श्लगा सिर्फ इस लिए करे जा रहा हे जिससे आप कुछ पलों के कैदी ही रह जाएँ खुद मे इतनी शक्ति नहीं की सब त्यागकर आपकी आवाज़ बुलंद करे बस आपको यों ही अत्म्करुना में घीरे देखना चाहता है .आप पीडा में करुणा देखते हे वो दूर बैठा खुश होता है की उसका प्रभाव अभी भी है .दोस्त में तो सच्चा दोस्त हूँ इसलिए कह रहा हूँ की उससे तो दुश्मन अछे जो अपनी भूमिका ईमानदारी से निभा तो रहे हैं
    —– आपका यह छदम फेन मेरे निशाने पैर है —-वह खुद कोई निर्णय तो कर नहीं प् रहा हे और छाता हे की उसकी छाप आप पैर से न मिटे !—–यायावार्जी अगर वो आपको इतना छटा है तो अपने उस गलत फैसले को तोड़ डाले —-फिर आये आपका कन्धा मजबूत करने के लिए और प्रस्तुत करे उस यायावर को जो युग निर्माण करता है –वरना मैंने तो अपने युद्घ का एलन कर दिया है ———आपकी रथ की पताका पैर बीतता हूँ और उसके हर अस्त्र को विफल कर दूंगा —-इसके लिए में आपकी अनुज्ञा लेना भी आवश्यक नहीं समजता —-मैंने दुश्मन को पहचान लिया हे वो आपकी समाज को उप्लाभ्ता में बाधक है में नाम नहीं बताऊँगा पैर में उससे आघा अवश्य कर रह हूँ –अगर मेरी भावना आपको गलत लगती है तो में इतना ही कहूँगा की अब आप अपनी सुप्त क्षमताएं जगैएँ व सुछे यायावर
    with my best wishes
    your best fan
    dr vishwas saxena

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  4. padmsingh says:

    फिर पथिक है ढूंढ़ता,
    विश्राम के आयाम को!

    देख कर परिदृश्य पागल,
    हँस पडे मुँह खोल पत्ते!

    व्यथा और परिदृश्य दोनों साक्षात् हैं ….. बहुत हृदयस्पर्शी

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