नब्जों के आहट की दस्तक

नब्जों के आहट की दस्तक,
सांसों के ताने-बाने में|
लिखने को लिखता ही गया मैं,
शब्दों को अनजाने में|
साँसों की कब डोर टूटे,
बस यूँ ही जीता रहता हूँ|
कागज़ के इन टुकडों पर,
बस यूँ लिखता रहता हूँ|

जब मन भी बोझ से दब जाता,
बारिश होती इन आँखों से|
सब छोड़ मैं तन्हाँ खो जाऊ,
खामोशी की शालाखों में|
नींद दर्द को कब आये,
बस यूँ ही जीता रहता हूँ|
कागज़ के इन टुकडों पर,
बस यूँ ही लिखता रहता हूँ|

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