“धरा के गर्भ में, सभ्यता की बीज”

धरा के गर्भ में,
सभ्यता की बीज|
तारिखें दुहराती रहीं,
मना-मना के तीज|
प्रहार होता रहा,
समय के दरकार का|
गतिशीलता के क्षोभ से,
धरा गयी है खीज|

धरा के गर्भ में,
सभ्यता की बीज|

पाषाणों की अभिव्क्तियाँ,
काल की स्नेही रहीं|
इति से अनंत तक,
सृजन की नेही रहीं|
सृजनता की चाह में,
धरा गयी है खीज|

धरा के गर्भ में,
सभ्यता की बीज|

सूर्य के परिभ्रमण में,
धरा का इतिहास|
भविष्य कालांतर में डूबी,
चिर साध्य की प्यास|
सभ्यता की प्यास में,
धरा गयी है रीझ|

धरा के गर्भ में,
सभ्यता की बीज|

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One Response to “धरा के गर्भ में, सभ्यता की बीज”

  1. Naaz says:

    Bahut sunder

    Like

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