कलम लेखको से लहू मांगती है!

अभी रिक्त भरना है! खाका चमन का,
नया रूप गढ़ना है! उजडे वतन का
पहाडो का दामन न छुए पडोसी,
सुला कर न गर्दन दबाये सपन का
सजाले पुजारी हृदय की उषा को,
धरा यह रवानी की बू मांगती है

कलम लेखको से लहू मांगती है!

वतन के लिये ही कलम जन्मती,
समर्पण वतन के लिये जानती है
वतन के बिना शब्द रहते अधूरे,
वतन को कलम ज़िन्दगी मानती है
हवन हो रहा है युगों से वतन पर,
वतन की चिता ज़िन्दगी मांगती है

कलम लेखको से लहू मांगती है!

प्रखर चेतना के नये गीत लेकर,
बहाती प्रवाहों की धारा धरा पर
क्षितिज लाल पूरब का करती कलम ही,
कुहासे की धूमिल घटाएँ हटा कर
विषम काल से जूझती है मगर अब,
शहादत की वेदी पे खू मांगती है

कलम लेखको से लहू मांगती है!

कलम क्रांति का कर रही है आमंत्रण,
कलम शांति का कर रही है निमंत्रण
कलम काल का भाल रंगने चली है
चली है दमन पर अमन का ले चित्रण
कलम सर कलम कातिलो का करेगी,
कलम आँसुओं की दुआ मांगती है

कलम लेखको से लहू मांगती है!

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3 Responses to कलम लेखको से लहू मांगती है!

  1. Pradeep ۩۞۩ with Little Kingdom ۩۞۩ says:

    Hey Anurag….

    good try….ur blog is good and ofcourse ur creativity too….

    Keep it up.

    Pradeep
    http://pradeepzpoems.blogspot.com/

    Like

  2. ashu says:

    gajab kavita hai bhaiya plz ek kavita hamare upar bhi likhna

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  3. श्रद्धा जैन says:

    Anurag

    aapki kalam mein bhaut taqat hai likhte rahiye

    ye line dil ko bhaut achhi lagi

    कलम क्रांति का कर रही है आमंत्रण,
    कलम शांति का कर रही है निमंत्रण
    कलम काल का भाल रंगने चली है
    चली है दमन पर अमन का ले चित्रण
    कलम सर कलम कातिलो का करेगी,
    कलम आँसुओं की दुआ मांगती है

    Like

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