अब फैसला हर ज़ुल्म का, करना है आपको!

शिकवा से कुछ होता नहीं, शिकायत न कीजिये
फरियाद होती है नहीं, पंचायत न कीजिए

अब फैसला हर ज़ुल्म का, करना है आपको!
“जैसे को तैसा” कीजिए, इनायत न कीजिए

चोट को न भूलिये, पत्थर उठाइये
पत्थर चलाने वालों पर, पत्थर चलाइये

इस बजारे-ज़ख्म के, सामान सब बने
साहब! “सामाजवाद” को आगे बढाइये

जब जलेंगी आशियाँ सारे ज़मात की,
मतलब सज़ा-ऐ-ज़ुल्म की सबको बताइये

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One Response to अब फैसला हर ज़ुल्म का, करना है आपको!

  1. Anonymous says:

    VERY GOOD………ANURAG

    Like

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