दूँढना हल शेष! अभी यारों

लड़ना है शेष! अभी यारों
बढ़ना है शेष! अभी यारों

बेइमानों को आज़ादी है,
चाटुकारों के घर चाँदी है
बदकिश्मत मिहनत-कश जनता,
जनता के घर बर्बादी है
गढ़ना है देश! अभी यारों
बढ़ना है शेष! अभी यारों

डंडेवालों का झंडा है,
धनवालों का हथकंडा है
मजलूमों को है कफ़न नहीं,
जीवन जीना ही फंदा है
मढ़ना है वेश! अभी यारों
बढ़ना है शेष! अभी यारों

अस्मत दो नंबरवालों की,
किश्मत दो नंबरवालों की
बाकी की इज्ज़त बिक रही,
बदत्तर हालत श्रमवालों की
भरना है शेष! अभी यारों
बढ़ना है शेष! अभी यारों

सब दो नंबर का भाषण है,
झूठा-झूठा आश्वासन है
मजबूर निगाहों में आँसू,
सोना-सा महँगा राशन है
जीना है शेष! अभी यारों
लड़ना है शेष! अभी यारों

छिना-झपटी है कुर्सी की,
सब खेल है खूनी कुर्सी की
भाई-भाई का कत्ल करे,
यह “फूट” करिश्मा कुर्सी की
बनना है एक! अभी यारों
बढ़ना है शेष! अभी यारों

सत्ता की अदला-बदली है,
पर नीति बड़ी ही दोगली है
हालत बद-से, बदत्तर ही है,
जनता भी खूब ही पगली है
दूँढना हल शेष! अभी यारों
बढ़ना है शेष! अभी यारों

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3 Responses to दूँढना हल शेष! अभी यारों

  1. श्रद्धा जैन says:

    aage badhna hai bhaut hi sunder kavita
    Anurag aapne jab jab kalam thaami hai
    kuch joshila bhavuk aur dil ko chhu lene wala likha hai
    likhte rahe

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  2. MADHAV CHANDRA CHANDEL says:

    वक़्त के साथ धूमिल होती हिंदी
    कहते हैं इसे भारत की बिंदी ,
    पहली बार इसे देखा
    वक्त के साए में विधवा होते हुए ,
    तभी आचानक ,,
    न जाने मैंने भी अन्ग्राइए लिया
    शायद वो मेरी हिन् भूल थी ,
    या मेरी हिन् सोंच थी
    की मैंने इसे किताबोंके पन्ने तक हिन् समझा
    समय के थापेरों ने में,
    वावासायी कारन के रफ्तार में मैं भी एक वैश्या बन गया
    पता हिन् न चला
    जन्मा ,बरा हुआ ,और भूल गया ,
    उन दो शब्दों को ,
    “माँ”
    जहाँ से हिंदी की सुरुआत हुई,
    माँ “mummy” में कब तब्दील हु ..और पिता “पाप में
    अजीब दास्ताँ हैं हिंदी की,

    भारत ..आपकी रचनाओं में आज के भारत में फिर से जान भरने की चमता है …..
    आपका ये प्रयास कभी विफल नहीं होगा ……हामरी सुभकामनाएँ सर्वदा आपके साथ
    हैं…
    अनुज माधव /०९/०८/२००८/पल्स मीडिया

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  3. Dr Vishwas Saxena says:

    Dear Anurag
    I am very happy to see a warrior in your poem.So atlast i see a yayawar true to this title.Now friend you have scanned the real scenario ,lets take next step, and that would be start a startegized efforts to these ills listed in the poem of yours——let’s begin with—-ok I wont tell let me se them in your forthcoming poetry loaded withammunition of desired social change.all the best already positioned at warfront your best fan
    Dr Vishwas Saxena

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