वात्सल्य की परिभाषा में “यायावर”

वात्सल्य की परिभाषा के,
प्रारंभ से अनंत की तलाश में,
भटकता एक “यायावर”
समय लाँघ उम्र खिसकती गई,
बचपन वहीं खडा है अभी तक,
जहाँ से तुमने शून्य को अपनाया

संबंधों की धक्का-मुक्की में,
भ्रम के कुहासे को चीरता,
जीवन का संदर्भ,
ढूंढता है माँ को!

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4 Responses to वात्सल्य की परिभाषा में “यायावर”

  1. namrata says:

    hi….nice poems….u have written….really too gd….
    desh ka saccha haal bayan kar diya aapne…. keep it up…..
    but i would like to know if these poems are published somewhere or they are only on ur blog?????

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  2. MADHAV CHANDRA CHANDEL says:

    वक़्त के साथ धूमिल होती हिंदी
    कहते हैं इसे भारत की बिंदी ,
    पहली बार इसे देखा
    वक्त के साए में विधवा होते हुए ,
    तभी आचानक ,,
    न जाने मैंने भी अन्ग्राइए लिया
    शायद वो मेरी हिन् भूल थी ,
    या मेरी हिन् सोंच थी
    की मैंने इसे किताबोंके पन्ने तक हिन् समझा
    समय के थापेरों ने में,
    वावासायी कारन के रफ्तार में मैं भी एक वैश्या बन गया
    पता हिन् न चला
    जन्मा ,बरा हुआ ,और भूल गया ,
    उन दो शब्दों को ,
    “माँ”
    जहाँ से हिंदी की सुरुआत हुई,
    माँ “mummy” में कब तब्दील हु ..और पिता “पाप में
    अजीब दास्ताँ हैं हिंदी की,

    भारत ..आपकी रचनाओं में आज के भारत में फिर से जान भरने की चमता है …..
    आपका ये प्रयास कभी विफल नहीं होगा ……हामरी सुभकामनाएँ सर्वदा आपके साथ
    हैं…
    अनुज माधव /०९/०८/२००८/पल्स मीडिया

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  3. riya says:

    bhawon ki atynt sundar abhiwykti…
    mujhe yah kavita bhut achchhi lgi anurag.
    riya singh

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  4. Very rightly written,perhaps in the fracas of this world i always search mother as this is the truest relatioship of the world.Very good poem keep it up.love Dr Vishwas saxena

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