“प्रश्न खडा था सामने, प्रतिउत्तर में जड़ जमाये”

शब्द का श्रृंगार करता,
मैं चला गुबार बनकर
रात-सी स्याही लपेटे,
दिन-सा खुमार बनकर

दिख पड़ी तब भूख मुझको,
राह में बाहें पसारे
मैं ये सोचू! कौन है?
जो एकटक मुझको निहारे
वक़्त इतना था नहीं,
कि थाम लू उसकी भुजायें
क्यूंकि इतना व्यस्त था,
ये सोच! लिखलू व्यंजनायें

लिया था मैं भाव उससे,
पीर में गंभीर का
स्वार्थ इतना था मेरा,
ना मोल समझा नीर का
चलना चाहा, भाव लेकर,
तब हंस पड़ी अभिव्यंजनायें
अट्टहास कर रहे थे शब्द,
उपहास करती दसों-दिशायें

प्रश्न खडा था सामने,
प्रतिउत्तर में जड़ जमाये
मैं हूँ अगर विशेष इतना,
संवेदना में सार का
कैसे? करूँगा सामना,
उपेक्षित ह्रदय के वार का

इन्द्रियाँ स्तब्ध थीं,
संवेदी का प्रतिकार बनकर
सर झुकाये चल पड़ा मैं,
अजेय भूख की हार बनकर

शब्द का श्रृंगार करता,
मैं चला गुबार बनकर
रात-सी स्याही लपेटे,
दिन-सा खुमार बनकर

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One Response to “प्रश्न खडा था सामने, प्रतिउत्तर में जड़ जमाये”

  1. ashu says:

    mast kavita hai bhaiya ek mast kavita hamare upar bhi bana do

    Like

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