जो शाब्दिक भी नहीं! भाषिक भी नहीं!

अनायास एक बंधन की सीमा,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

ह्रदय अधरों के,
उर्ध्वाधर संबोधन से,
संबोधित करती,
कहीं दूर, बहुत दूर,
जाते हुए राही को

दूर-दूर तक सन्नाटा-विराना,
सिमटती सासों में खामोशी,
खामोशिओं को चीरती बंधन की सीमा,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

स्थिरता भंग करती तरंगें,
किनारों तक जाते-जाते,
ख़त्म हो जातीं,
तरंगों से न जाने कब-कैसे,
कटते चले जाते,
मिटते चले जाते,
पता ही नहीं चलता,
किनारों का विस्मय,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

यादों की चंद लड़ियों में,
उलझा अतीत
यादें जो साथ होती हैं,
जब तुम साथ नहीं होती
लटों में छुपा खिलखिलाता चेहरा,
करता अंधेरे का श्रृंगार
आखों में तैरती तुम्हारी छाया,
दीवारों से बातों का सिलसिला,
एक कहानी जो आसमां की तरह,
तुम्हारे बीच का फासला जीवंत करता,
टूटने से पहले,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

न जाने कितने रहस्यों का आयाम,
पलकों को भिगोतीं,
फिर भी होठों पर सूखी लकीर,
क्षितिज में डूबता सूरज,
कहने को बहुत कुछ,
पर वक़्त उतना ही कम
आँखों ने जब देखा,
सरकती सी धुप,
उढ़ता आँचल,
बिखरते गेसूं,
गुजरता मंज़र,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

दरख्त की टहनियां,
उदास सी हुई,
पत्तों ने भी पतझड़ में,
उनका साथ न दिया
हालतें ही ऐसी रहीं,
उन्होंने सब कुछ लौटा दिया,
जो मुझसे लिया था
पर शायद वो भूल गये,
क्या-कुछ हमने उन्हें दिया था
इंतजार की हद,
आज भी मेरी जहन में,
जीने के इशारों पर,
क़यामत के किनारों पर
नजरें आज भी ढूढ़ती हैं,
तुम्हारे हर पहलु को,
जिसमें महसूस करता हूँ,
अपने आपको,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

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2 Responses to जो शाब्दिक भी नहीं! भाषिक भी नहीं!

  1. dixit says:

    Ni-Sandeh ati uttam !!!

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  2. Pankaj says:

    bahut khub! kya bat hai!

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