भाषणों से युग बदलने का नहीं

कुछ नई हिम्मत से रचना कर दिखाओ,
भाषणों से युग बदलने का नहीं
बेबसी का पाश है जब तक नियंता,
पश्चना का दैत्य टलने का नहीं
भाषणों से युग बदलने का नहीं

जब तलक हम बातें करते जा रहें,
कर्म के हित स्वांग भरते जा रहें
हो सकी कुछ भी नहीं तब्दीलियाँ,
बेकसों के नयन झरते जा रहें
नव-सुबह की रौशनी जब तक न निकले,
दीप से अब काम चलने का नहीं
भाषणों से युग बदलने का नहीं

व्याप्त अंतर्दाह है नैराश्य का,
लुट गये निज रहबरों के छद्म से
क्षुब्ध हैं! हैवानियत से क्या करें?
बुझ चुके! नियत चल रहे प्रपंच से
अनय को कुचले बिना कुछ भी न होगा,
सांत्वना से मन बहलने का नहीं
भाषणों से युग बदलने का नहीं

कागजों पर चल चुकी गाडी बहुत,
योजनाएं लग चुकीं खारी बहुत
क्या पता कब तक चलेगा ढोंग यह,
हो चुकी है मौत से यारी बहुत
है जहाँ पड़ती ज़रूरत ढेर की,
बूंद से जीवन संभलने का नहीं
भाषणों से युग बदलने का नहीं

नाच-रंग, नाटक-तमाशे हो चुके,
वायदों के गर्त में सब सो चुके
मानवी इज्ज़त लगी है दाँव पर,
जिंदगी के ख्वाब धूमिल हो चुके
ठोस धरती पर कदम रखे बिना,
कल्पना से हल निकलने का नहीं
भाषणों से युग बदलने का नहीं

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One Response to भाषणों से युग बदलने का नहीं

  1. Dr Vishwas Saxena says:

    good yayawar good
    carry on this way thank god you are fast drifting towards action crushing that latent penisive mood of lamentation—I am happy to see you launched to illuminate the world.Best of luck
    Best fan
    Dr Vishwas saxena

    Like

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