मैं यायावर!
पथ का गमन,
विश्राम मेरा|
मैं मिला था,
कब किससे?
क्यूँ मिला था?
वो तो थे,
पथ के मेरे,
विराम अपने|
शेष समर की धुल,
चाटनी मुझे अब|
फांकना है गर्द का,
गुबार सारा|
शूल से सने मेरे,
आहार दे दो|
रख लो तुम,
व्योम का श्रृंगार सारा|
मैं अकिंचन!
है भ्रमण संधान मेरा|
मैं यायावर!
पथ का गमन,
विश्राम मेरा|
मैं चला हूँ,
अन्तः में संकल्प लेकर|
कहाँ तक?
शुन्य का विस्तार होगा|
इसकी परिभाषा,
जीते जी नहीं मिली तो|
ढूंढ़ लूंगा मैं,
मृत्यु के उस पार होगा|
सारी तड़प, सारी तपिश,
मुझे सौंप दो तुम|
यूँ ही जलना-बुझना,
है अभिमान मेरा|
मैं यायावर!
पथ का गमन,
विश्राम मेरा|
मेरी अस्थि, मेरा रोम,
तुम्हें समर्पित|
कर लो सृजन,
कुछ कर सको,
मेरे अंतिम क्षण का|
फिर तो मैं,
निर्बाध होकर चल पडूंगा|
निर्वात की काया में,
अपना सर्वस्व देने|
मैं ठहरता हूँ नहीं,
पाषण बनकर|
विधि यही,
है यही विधान मेरा|
मैं यायावर!
पथ का गमन,
विश्राम मेरा|
ऐसी परिभाषा मिलती कहाँ?
जो मनुज तन को परिधि दे!
अगर मांगना है तो मांगो,
हे!… ईश्वर!
सम्पूर्ण विश्व को समृद्धि दे!
“मन जितना विचरा घट-घट में, समझो उतने तीरथ कर धाये!
क्या मंदिर? मस्जिद, क्या गिरजा? यह सब तुमने व्यर्थ बनाये!”
जीवन का सारतत्व,
यायावर-सा स्थाई|
निमित-मात्र में सांसों की,
कोसों-कोसों तक गहराई|
यक्ष प्रश्न अस्तित्व पटल पर,
अब आंखें मेरी पथराई|
मैं यायावर ढूंढ़ रहा,
है कहाँ पृथ्वी की परछाई?
वात्सल्य की परिभाषा के,
प्रारंभ से अनंत की तलाश में,
भटकता एक “यायावर!”
समय लाँघ उम्र खिसकती गई,
बचपन वहीं खडा है अभी तक,
जहाँ से तुमने शून्य को अपनाया|
संबंधों की धक्का-मुक्की में,
भ्रम के कुहासे को चीरता,
जीवन का संदर्भ,
ढूंढता है माँ को!


Poetry is always the best way to express your innermost feelings and speak out your emotions. It is a difficult thing to express strong emotion sincerely. Have faith in God, he will never ever disappoint you, never let you down. Keep making people feel your emotions, and never stop…Just keep writing!
अनुराग, ज़िंदगी में कितनी भी कठिनाई का सामना करना पड़े…हार कभी नही मानना. हर इंसान को भगवान किसी उद्देश्य से भेजते हैं, और उद्देश्य को सही रूप में सार्थक करना ही हमारा कर्तव्य है. मैं बस इतना ही कह सकती हूँ कि अपने लिए जीना कोई जीना नही है, जीना उसका जीना है, जो औरों की खातिर जिए!
“हो क्षितिज कितनी ही दूर
सूरज को भी ढलना होगा
छोड़ दूर किनारे की चिंता
‘यायावर’ तुझको चलना होगा!”
rgds.
उपर्युक्त टिप्पणी में कही गयी कविता की प्रशंसा में शब्द नहीं मिल रहे
जीवन का सारतत्व,
यायावर-सा स्थाई|
निमित-मात्र में सांसों की,
कोसों-कोसों तक गहराई|
यक्ष प्रश्न अस्तित्व पटल पर,
अब आंखें मेरी पथराई|
मैं यायावर ढूंढ़ रहा,
है कहाँ पृथ्वी की परछाई?
शब्द नहीं जिह्वा पे बस, ह्रदय पूर्ण है सप्रीति आदर से |
अनुराग बाबू आपका तो नंबर ही नहीं लग रहा…. क्या बात है सब ठीक-ठाक… शादी का दिन तय हुआ या नहीं.. संभव होगा तो जरूर बताइगा..
गौरव
mama ji maine aapka parichay padha aacha laga…………
लम्बे अरसे से कोई अच्छी कविता नहीं पढ़ी थी .
धन्यवाद REWA DIDI का जिनकी वजह से आपके इस link तक पहुंचा . बहुत सी सुन्दर और बधे हुवे ओजस्वी शब्द का संधान है आपका.
अपने अच्छे प्रशंसकों में मेरा भी नाम शुमार कर सकते हैं .
धन्यवाद एवं आदर !
aap ka parichy pdh bhut acha hai
मैं चला हूँ,
अन्तः में संकल्प लेकर|
कहाँ तक?
शुन्य का विस्तार होगा|
इसकी परिभाषा,
जीते जी नहीं मिली तो|
ढूंढ़ लूंगा मैं,
मृत्यु के उस पार होगा|
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