स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

February 5, 2012

स्वप्न के इस नीर में आकाश कितना!
है तिमिर को साधता प्रकाश कितना!

सुप्त कण के जागरण में तुम जुटे जब,
चेतना के अंक का आभास कितना!
हो रही है धूंध अपने ही गहर में
दिप्त होते बिम्ब में अवकाश कितना!
स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

स्याह-सा कुछ आवरण में कुढ़ता क्यों?
पथ से पथिक के मोह की मूढ़ता क्यों?
परिणाम के परिपथ में पिसता विश्वास कितना!
स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!

पसरे हुए निर्वात में निमित्त समेटे,
बाती विधि की जल रही सबकुछ लपेटे।
जो जल रहा उसका है प्रवास कितना!
स्पप्न के इस नीर में आकाश कितना!


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