संभव रचना इतिहास नहीं|

October 15, 2010

यदि लुप्त हो मन का संबल,
स्वयंभूति विश्वास नहीं|
तो, यह सत्य अटल है इतना,
संभव रचना इतिहास नहीं|

किसका कितना दर्श करेगा,
किस-किस को स्पर्श करेगा|
यदि चेतना मृत हो तेरी,
तो, तू क्या स्पष्ट करेगा|
संशय की जिह्वा में लिपटी,
यह अनुभूति उपहास नहीं|
संभव रचना इतिहास नहीं|

हे! स्वयं तुम्हारा क्या परिचय?
क्यूँ परिभाषा तुम खोते?
तुम व्यक्त हुए तो, व्यक्ति हो,
अन्यथा पकड़ अब क्यूँ रोते|
अभी शेष संदर्भ तुम्हारा,
व्यथा कोई उपवास नहीं|
संभव रचना इतिहास नहीं|


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