पत्थरों का प्राण कहता,
युग भी निर्माण कहता|
कपकपाते होंठ कहतें,
पोंछ दो आंसू जो बहतें|
जीर्ण-जीर्ण को तृण कर दो,
विवश शब्द को ऋण कर दो|
आगमन में दसों दिशाएँ,
देख तुमको मुस्कुराएँ|
फिर बसंती वात बहती,
कूक कोयल क्या न कहती?
समझने की फेर कैसी?
समझ लो तो देर कैसी?
बंधनों पर प्रहार कर दो,
हर दिवस त्योहार कर दो|
अम्बर का आनन् न सूना,
अभी तुम्हें अम्बर है छूना|
ओज का तू दर्श कर ले,
दर्द का स्पर्श कर ले|
आस्था की मूर्तियों में,
तू मूर्तियों की आस्था है|
तू नहीं कुछ जानता है,
तू क्यूँ ऐसा मानता है?
Posted by यायावर

