खुरच रहा था उम्र को,
ये सोच कर पड़ाव पर|
मैं खाली हाथ क्यूँ रहा,
लक्ष्य के चढ़ाव पर|
समय के इस चक्र का,
आवर्तन क्यूँ अब गौण है?
मेरी इस आपत्ति पर,
स्वयं “मैं” में मेरा मौन है|
राह चलता ही रहा,
सूत्र के संधान में|
मेरी क्या है भूमिका,
विधि के विधान में|
शेष न संभव हो सका,
अवशेष के अन्तराल में|
गर्त में बढ़ता चला,
जो भी मिला उस काल में|
Posted by यायावर

