तुम प्रसस्ति हो पिता के,
तुम प्रसस्ति के पिता हो|
है तेरा पदचाप अनुगम,
अनुपालक की तू शिला है|
अनवरत है चक्र जीवन,
जिसकी विधि पर तू खिला है|
सुनो!
समस्त स्वप्न है ये,
टूटना अनिवार्य जिसका|
किन्तु कर्त्तव्य पथ के अधर पर,
पुनः पुनः है कार्य जिसका|
तू भी चल!
मैं भी चलूँगा!
समस्त का निर्माण करने |
पथ सृजन से पथ गमन तक,
देवत्त्व का वरदान बनने!
मैं भी चलूँगा!
समस्त का निर्माण करने |
पथ सृजन से पथ गमन तक,
देवत्त्व का वरदान बनने!


प्रिये अनुराग
तुम्हारी एक और उत्कृष्ट कविता पढ़ी , और बोध हूआ की तुम वास्तव में काव्य की ऊँचाई प्राप्त कर चुके हो .सतत ऐसे ही लिखते रहो ———-इस कामना के साथ
डॉ विश्वास सक्सेना
No waords to even appriciate….
Maa Saraswati has bestowed upon u the gift of using ur words powerfully….
God Bless & best of luck, Sir….