हे! नवयुग के नवदीपक!
तुम नवयुग के अभिमान हो!
सम्मान हो!
वर्तमान हो!
तुम ही चिर महान हो!
तुम पौरुषता के पुंज हो!
स्वयं अपनी पहचान हो!
क्षण-भंगुर नहीं प्रसस्ति तुम्हारी,
तुम श्रृष्टि के अस्तित्व समान हो|
हे मृतुन्जय!
हे धनञ्जय!
तुम चिर रत्न के प्राण हो|
क्यूँ टूटे तेरा संबल,
तुम धैर्यवान! कृपा-मुस्कान हो!
नहीं अभेद कोई लक्ष्य तेरा,
तुम स्वयं अर्जुन की बाण हो!
हे! सर्वश्रेष्ट कृति धरा के,
तुम सर्वगुण सम्पन्न संज्ञान हो!
परिचय ते़रा! तुम में क्या अवगुण?
तुम तो निर्गुण के निर्माण हो!


superb..
bhaiya aap ne hume hamari pahachan kara di .
aur nishkam karm ki shichha bhi de di..
dhanya ho … prabhu
Dear anurag
Please accept my congratulationsss on such a stiumlating,motivating and action linked composition of yours.You have crossed a level where every appreciation seems to be little for your many folded excellence of your poetry.Regards
Dr Vishwas Saxena
नमस्कार यायावर जी
यथा हिंदी देवनागरी के अतिरिक्त किसी और लिपि में अछि नहीं लगती तथा यदि कुछ इसमें व्याकरणात्मक त्रुटियां हो तो भी उसकी शोभा कम हो जाती है
कुछ शब्द हिंदी व्याकरण सम्मत नहीं है कृपया इनमे संशोधन करें
प्रसस्ति श्रृष्टि मृतुन्जय
परन्तु निस्संदेह आपकी कविता बहुत ही प्रभावशाली है विशेषतः युवा पीढी के लिए
हमेशा ऐसे ही साहित्य सृजन करते रहिये
खैर मैं आपको बताने चला था बाद में खुद की टिप्पणी दखी उसमे ही त्रुटियां मिल गयी
खैर मैं आपको बताने चला था बाद में खुद की टिप्पणी देखी उसमे ही त्रुटियां मिल गयी