मेरी सबसे बड़ी कमजोरी,
महसूस करता हूँ मैं,
अकेलापन!
जो निश्चय ही मुझे,
अलग करती है,
जब होता हूँ मैं,
सैकडों की भीड़ में|
वही एकाकीपन!
बरबस संवेदनाओं के,
सागर का उमड़ना|
लहरों की सिलवटों में,
न जाने रेत के कितने कण|
फिर भी हर क्षण,
वही अकेलापन!
डूबती हुई नब्जों में,
जमता हुआ खून|
रिश्तों में कम्पन्न,
आस्था में परिवर्तन|
दम घुटता है मेरा,
क्यूँ जीने का सम्मोहन!
आँखों में आसमान,
ज़मी पर पैरों के निशान|
रेत के टीले,
फिर जोरों का तूफ़ान!


VERY VERY NICE POEM..सीधा दिल को छूती है ये रचना…आज अकेलापन हर इंसान में बढ़ता जा रहा है!भीड़ में भी हर कोई अकेला महसूस करता है,..
bahut badhiya rachna hain………bahut achchi…aaj ki sachchayi ko bayan karti hain! bahut badhiya!!!
dear anurag
I cant understand that how can you feel alone when you are always accompanied by ever whispering sensuality of yours.And now coming to relationship let me share with you that they change with time and tide.Never become a slave of one single emotion but welcome all.life is too short to wail and cheer long for lost and found relations. Keep on living earnestly is the best tradition
Your best fan who appears to be critic
Dr vishwas saxena
bahut he marmatmak aur origanal
i adore yr creations..u are marvellous!!
एक गन्ध……….
जून के महीने सी भटकती हवा
रोज मेरे ह्रदय को जलाती है
जो आंच चूल्हे में होनी थी
वो ही आंच
चूल्हे की बुझती राख को कुरेदती है
उधार की अधपकी रोटी
उस आंच को ढून्दती है
एक ग्रास तोड़ती है
और घुटनों पे हाथ रखके
राख में आंच को मौड़ती है
पंजाब के पीले गेहू और
बिहार के ज़र्द होंटों के छाले
आज बिलखकर
आंच को आवाज़ देते हैं
आंच हर गले स्याह दर्द देती हुई
चीख मारकर
बंगाल की खाड़ी में गिरती है …
कब्रिस्तान से
एक गन्ध-सी आती
और श्मशान पार बैठे
श्मशान-घरों के वारिस
आंच की इस गन्ध को
साँस की गन्ध में भिगो कर पीते है …
चूल्हे की आंच धीरे धीरे
ह्रदय में उतरने लगती है
और चूल्हे के दूसरे वारिस
भूख के धुवे में
तक़दीर की गन्ध ढून्दते है
और आंच का वो धुँआ
मंदिर के आहाते जाकर
विलीन हो जाता है
मंदिर की छोटी दिवार
और मोटी हो जाती है
पुजारी का पेट उस गंध से
तृप्त होकर
गंध और आंच में अंतर ढून्डने लगता है ….. आक्रोशित मन..