मैंने उसके सर पर हाथ फेरा…उसकी आँखों से आंसू निकल पड़े! जैसे मुझसे वह पूछ रहा हो…”क्या कसूर है मेरा?” न जाने सवालों की ऐसी ही कितनी लडिओं से उसकी आँखें सराबोर! मैं अवाक्-सा रह गया..क्यूंकि मेरे पास कोई प्रतिउत्तर नहीं था| मेरा आत्मसम्मान ग्लानि में विलीन होता चला गया लेकिन उस वक़्त मैं व्यक्तिगत नहीं था|
मैं बस स्टैंड से अपने घर की तरफ तेज़ क़दमों से आगे बढ़ रहा था कि अचानक किसी ने मेरी ऊँगली पकड़ ली| पीछे मुड़कर देखा एक छोटा-सा बच्चा था| जिसकी उम्र लगभग पॉँच वर्ष की होगी…एकदम काला-कलुठा…बाल बिखरे हुए|…उसने केवल एक हाफ-पैंट पहन रखी थी वह भी फटीचिटी!..उसे देखते ही मैं बिदक गया…उसका हाथ झटकते हुए कहा “भाग यहाँ से!”
अब मैं और भी तेज़ क़दमों से घर की तरफ बढ़ने लगा यह सोचकर कि कहीं वह दुबारा न मेरे सामने आ धमके| लेकिन उसका चेहरा बार-बार मेरी आँखों के सामने तैर रहा था…ऐसा लग रहा था मानो जैसे… किसी ने मेरे पैर कसकर जकड़ लिए हों| मैं अपने कुलीन संस्कारों की रक्षा में क़दमों को तेजी से बढ़ाने के क्रम में प्रयासरत था लेकिन वहीँ दूसरी तरफ समाज से बहिष्कृत उसी के संस्कार के एक अन्य पहलू ने मुझे आगे नहीं बढ़ने दिया| कुछ देर तक मैं चुपचाप खड़ा..ये सोचता रहा ….”क्या करूँ?”
मैंने उससे पूछा -”क्या नाम है तेरा?”
“नाजाज़!”
“किसने रखा तेरा ये नाम?”
“नहीं मालूम! सब यही कहते हैं|”
उसके ज़वाब मैं किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं थी|
“तेरे माँ-बाप?”
“नहीं मालूम!”
उसके इस ज़वाब ने मेरे अन्दर विषाद घोल दिया, लेकिन उसके इस ज़वाब में उसकी अपनी पहचान झलक रही थी| समाज की सच्ची सूरत बनकर…!
“भूख लगी है तुझे?”
“हाँ!”
“क्या खाएगा?”
“रोटी!”
“फिर क्या करेगा?”
“कुछ भी नहीं!”
उसे लेकर मैं एक होटल में गया| देखते ही होटलवाले ने कहा -”खामखा परेशान होते हो बाबूजी! ये तो इनका रोज़ का काम है…. किसी न किसी साहब को रोज़ पकड़ लाते हैं और उनसे पैसे खर्च कराते हैं|”
मैंने हंसते हुए कहा -”इसमें फायदा भी तो तुम्हारा ही होता है ना, तुम्हें तो खुश होना चाहिये|”
मैंने पूछा -”क्या तुम इसे जानते हो?”
“बाबूजी! खूब अच्छी तरह से जानता हूँ इसे…है स्साला किसी की नाजायज औलाद! यहीं पड़ा रहता है…ना माँ-बाप का पता और ना घर का ठिकाना!”
उसकी इस बोली को सुनकर मेरा मन हुआ की उसे कस कर दो झापड़ रसीद करूँ…डांटते हुए उसे चुप रहने को कहा| वह चुपचाप अपने काम में लग गया…थोड़ी ही देर में बच्चे के हाँथ में खाने को कुछ देते हुए कहने लगा -”क्यूँ गुस्सा होते हो बाबूजी! चाहे जो भी हो..सच्ची बात तो यही है ना!”
उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए मैंने कहा- “हाँ! यही है…हमारे अपने समाज की सच्चाई!”
मैं उस बच्चे को वही छोड़ कर घर चला आया, लेकिन उस बच्चे के लिये समाज का ऐसा रवैया…मुझे कचोट रहा था| मेरा अंतर्मन प्रश्नों के द्वंदों की रस्सा-कस्सी से जूझ रहा था| कैसा समाज है हमारा? भावनाओं, संवेदनाओं को ताख पर रखकर एक नन्हीं-सी जान को मरने के लिये फेंक देते हैं हम…कभी सड़क पर!…कभी कूडे के ढेर पर!…क्या जीवन का अस्तित्व इतना ही समझ पाने में हम सक्षम हैं?..इस सक्षमता में कहीं न कहीं अपने दामन पर लगनेवाले दाग को छुपाने की समझ है! … हाँ!…अवश्य ही विवश करता है हमें हमारा मान-सम्मान, प्रतिष्ठा और कुल मर्यादा! ऐसा ही होता है …खोखले समाज की रखैल आडम्बरों के मान-प्रतिष्ठा की रक्षा में!
मासूम चेहरा…! अधखुली आँखें…! छोटे-छोटे कोमल हाँथ-पैर…! बंद मुट्ठी…!
बंद मुट्ठी…! से फिर भी छिनते हैं हम…उस मासूम का बचपन..उसकी जायज पहचान| एक असहाय की मज़बूरी का कितना गैरजिम्मेदार होकर लाभ उठाते हैं हम…क्यूंकि वो मासूम चिलाकर या लड़कर हमें रोक नहीं सकता…अपने हक के लिये! आखिर यह प्रश्न किसके सामने रखा जाये..कि वह जायज क्यूँ नहीं? समाज के सामने या उस मासूम के सामने…!


यह प्रश्न तो खुद के सामने ही सब रखेंगे तब ही बदलाव आयेगा.
बहुत अफसोसजनक एवं दुखद.
bhaiya pranam,
ye prashna aaj ek ktu satya ban ke ubhar rha hai..
waise to hum sarwa sikchha ke sapne , sarwa sampannta ke nare lagate hai , par usi duniya ka yah bhi ek bhavishya hai,, jo aage jakar Slum Dog ban kar nam roshan kar rhe hain.. bachche desh ka bhavishya hote hain , aur ye bachche bhi kal ke bhavishya hi hain. par unka yogdan kal ne navnirman me nahi vinash me hoga , jiske jimmedar aur koi nahi sirf samaj hi hai, jo kal unhe unke galt karyon ke liye jimmedar thahrayenge…jab pend boya babur ka to aam kahan se hoga..
dhanyavad
Yayawar ji aapki prastuti bahut hi sahaj aur marmik hote huye bharteeya samaj ki aisi burai ki taraf sanket karti hai jo na jaane kab se hamare samaj ko deemak ki tarah khaye ja rahi hai.
Piyush ji ne shat pratishat satya kaha ki ye bachhe kal ke bhavishya honge kintu inka yogdan vikas mein nahi vinash mein hoga.
Inhe samaj mein bachpan se hi bhartsna ke teer bhalo se mansik taur par ghayal kiya jata hai jo aage jakar burai mein hi parinat hota hai.
Jab tak hamari taraf se koi sakaratmak pahal na ho hum matlab aap main sabhi in masoom bachcho ko milne wali aisi saja pane se koi nahi rok sakta jiske ye haqdar katai nahi.
namaskar yayawar jee , kafi marmik prastuti hai aapki , ekdum sahi prashn uthaya hai aapne isko samaj ke samne hi rakha ja sakta . aaj ke daur ki patrakarita aap jaise lekhko hi chahti hai , lage rahiye hamari shubhkamna aapke sath hai……….
मैं ये सोच रहा हूँ …की जो इन प्रन्श्नो के उत्तर मिल भी गए तो क्या ?
इन उत्तरों का रूप, इन प्रश्नों से कम भयावह नही दीखता …अगर समाज की हर छोटे-बड़े कडवे सच को हम रुक कर खड़े हो कर देखने की हिम्मत करें, तो कदाचित जीने से मन उठ जाएगा| “पर”, “किन्तु”,”परन्तु” की मृग त्रिश्नाओं से बच कर निकल भी गए तो अपने आप को एक गहरे अन्धकार में आशा की बैसाखी लिए खड़े पायेंगे कहीं| ऐसे में – “सब मोह माया है” कह मुह फेर लेना ही एक अंतिम दुखद उत्तर रह जाता है|
Samaj, basically it is a society made by people who can not survive at their own. Tiger do have a society, but rule is competence will survive. the result is Nikammi Nasal hi aage nahi badhti. Sounds a bit wild, jungle rule. A couple is supposed to control their emotions just because they are in Kuleen Gharana. These Kuleen-ness is also a Fake Staus Symbol. To keep going on the trust and effect of that Kuleen-ness, all bat trials are taken. Your “NAJAYAJ” is just one image out of our 4000 yr old great but still declining Self-Satisfactory-Self-Explanatory sanskrti.
जीवन की यह सच्चाई सही है मगर उसका अर्थ अब मैं समझ गई हूँ। पहले तो ऐसी घटनाओं से विचलित होना होता था मगर अब इन घटनाओं के साथ जीना कैसे है यह जान चूके है।