मृत्यु! आत्मा का अज्ञातवास!

October 13, 2009
दंभ निमित में मृगतृष्णा के,
गहन-सघन स्वांस अभ्यास|
पुनः व्यंजित वृत्त-पथ पर,
आत्मा का पुनरुक्ति प्रवास|
कल्प-कामना के अनंत में,
लिपिबद्ध अपूर्ण उच्छास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है, जीवनवास|

अवतरण का,
सत्य, मिथक क्या?
यह भ्रम, मन का,
पूर्वाग्रह है|
ज्ञात यही,
अवसर-प्रतिउत्तर|
जिस काया में,
बसता मन है|
पूर्वजन्म की स्मृति शेष,
ज्यौं पुनः न करती देह-अवशेष|
किंचित यह भी ज्ञात नहीं,
तब क्या था?
क्यूँ जीवन पाने का धर्म है?
पूर्व जन्म का दंड मिला,
या
यह अगले जन्म का दंड-कर्म है|
सत्य का संधान न पाकर,
निर्वात उकेरता एकांतवास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है, जीवनवास|

लिप्त कर्म में,
दीप्त कर्म में,
संचित धर्म,
निर्लिप्त आयाम|
कैसा दर्पण श्लेष दृष्टि का?
भूत-भविष्य का कैसा विन्यास?
क्यूँ भ्रम को स्थापित करते?
खंडित कर दो सारे न्यास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है जीवनवास|

जो निश्चय था,
तुम्हारे मन का|
पूर्ण से पहले,
वह अविचल है|
जो लिया यहीं से,
देकर जाओ|
यही कर्म है,
यहीं पर फल है|
त्याग-प्राप्ति संकल्प तुम्हारा,
है, तर्कविहीन तुष्टि का सन्यास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है जीवनवास|


राष्ट्रभाषा का तमगा मिले, तुम्हारी पैरवी करूँगा|

September 4, 2009

सुनो! तुम्हें आती है,
खिचड़ी  पकानी,
अंग्रेजी और हिंदी की|
नहीं आती न?
अच्छा! अंग्रेजी में हिंदी,
या हिंदी में अंग्रेजी का,
चटपटा पकवान बनाकार,
गर्व से सीना चौड़ा करके,
उसे परोसना|
कुछ तो सीखा होगा तुमने….
नहीं सीखा?
तब तो तुम,
बिलकुल नहीं चल पाओगे,
और बचा भी नहीं पाओगे,
अपने बचे-खुचे अवशेष को|
महसूस किया है तुमने,
अंग्रेजी के उन्माद को|
जब कोई बेटा हिंदी में,
अंग्रेजी मिलाकर,
अपनी माँ से कहता है-
“माँ आज तुम बहुत सेक्सी लग रही हो”
हा..हा..हा..! उस वक़्त..! उस वक़्त..!
माँ भी वातशल्य को,
क्षण-भर भूल,
निहारने लगती है,
अपने सोलहवें सावन को|
अपने पुराने ढर्रे पर,
चिपों-चिपों करते हो|
क्या हुआ तुम्हारी जननी,
संस्कृत का?
जिसके गर्भ में,
अविर्भाव हुआ था तुम्हारा!
वह भी गायब हो गयी न,
गदहे की सिंघ की तरह|
बात करते हो साहित्य की?
चलो मनाता हूँ,
साहित्य दर्शन है,
लेकिन ये बताओ कि,
दर्शन का भी,
संगठन होता है क्या?
और होती हैं क्या?
इसकी भी प्रतियोगिताएँ,
अपने व्यक्तित्व को,
श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिये|
हिंदुस्तान में,
तुम्हें शुद्ध बोलने वाले कम,
और तुम्हारे नाम की,
रोटी खानेवाले ज्यादा हैं,
गौर किया है कभी तुमने?
वर्ण, जाति, धर्म और
परंपरा का संगठन,
या फिर कोई भी,
मनचाह संगठन,
जानते हो कब बनता है?
इसके भी व्यतिगत रूप से,
बहुत पहलू हैं,
अपने-अपने हिसाब से|
लेकिन मुझे,
जो पहलू मुख्य लगता है,
वह है उसके लोप होने का भय|
अच्छा ये बताओ…
सुना है तुमने कभी,
कि शेरों ने मिलकर,
गीदडों  के खिलाफ,
बनाया हो संगठन|
हा! इतना ज़रूर है कि,
गीदड़ एक साथ मिलकर,
हुआं-हुआं करते हैं,
वो भी दिन में नहीं,
अमावस की रात में|
जानते हो,
तुम्हारी सबसे बड़ी,
विवशता क्या है?
तुम “एलीट” नहीं बन पाये|
तुम में कोई योगता नहीं,
कि तुम्हें राष्ट्रभाषा का,
तमगा मिले,
ये कैसे हो सकता है?
फिर भी मैं,
तुम्हारी पैरवी करूँगा|
कानूनी किताब में तुम,
हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा,
के नाम पर,
दर्ज कर दिए जाओगे|
लेकिन…
मेरे एक अंतिम प्रश्न,
का उत्तर दे दो|
यही तुम्हारी योग्यता,
मान बैठूँगा|
कहाँ से लाओगे,
अपने प्रेमियों को,
जो तुम में,
आस्था बनाये रखेंगे तबतक,
जबतक रहेगी ये सम्पूर्ण सृष्टी|
तुम चीटिंगबाज़ी करके,
दे सको अगर इसका उत्तर,
तो इस बात की भी,
तुम्हें छुट है….


अभी नहीं करता तुम्हें, अंतिम प्रणाम!

September 1, 2009
श्वे़त  पर ज्यों,
श्याम बिखरें हैं,
यथावत!
श्लेष भावों के वरण में,
अन्तः का प्रकल्प लेकर|
नित्य प्रतिदिन,
मृत्यु करती है आलिंगन,
पुनर्जीवन के दंभ का संकल्प लेकर|
 
अट्टहास-सा क्रंदन समेटे,
बाहु-पाश में|
अलिप्त-सा,
अब लिप्त क्यूँ?
किसी अप्रयास में|
 
है विधि का चक्र ज्यों,
होना निष्प्राण|
श्रेष्ठ यही,
विष्मृत  न हो, 
जीवन-प्रमाण|
 
माध्य हूँ मैं कर्म का,
कर्त्तव्य-पथ पर|
गंतव्य से पहले मेरा,
वर्जित विश्राम|
 
हे मृत्यु! तू ही ले,
अपनी गति को थाम|
अभी नहीं करता तुम्हें,
अंतिम प्रणाम!
 
मोक्ष नहीं कि,
तू मिले,
अनायास मुझको|
सोच यह कि काल ने,
निगला मुझे है|
ग्रास हूँ मैं वक्र-सा,
सहज नहीं हूँ,
सृजन-बीज हूँ,
काल से डरता नहीं मैं|
 
तेरी अपनी पीड़ा,
तेरी अपनी हार का|
मैं तो रहा सदा वंचित,
तेरे अनगिन प्रहार का|
याचक नहीं कि स्वार्थवश,
बनूँ प्रार्थी!
क्यूंकि है अन्तरिक्ष स्वयं,
मेरा सारथी!
 
हे मृत्यु! तू ही ले,
अपनी गति को थाम|
अभी नहीं करता तुम्हें,
अंतिम प्रणाम!

देवत्त्व का वरदान बनने!

June 27, 2009
तुम प्रसस्ति  हो पिता के,
तुम प्रसस्ति  के पिता हो|
 
है तेरा पदचाप अनुगम,
अनुपालक की तू शिला है|
अनवरत है चक्र जीवन,
जिसकी विधि पर तू खिला है|
 
सुनो!
समस्त स्वप्न है ये,
टूटना अनिवार्य जिसका|
किन्तु कर्त्तव्य पथ के अधर पर,
पुनः पुनः है कार्य जिसका|
 
तू भी चल!
मैं भी चलूँगा!
समस्त का निर्माण करने |
पथ सृजन से पथ गमन तक,
देवत्त्व का वरदान बनने!

आने वाली हमारी नस्लों की नकारात्मक मानसिक विपदा से सुरक्षा के लिए!

May 5, 2009
सदार नमस्कार!
मेरे भाइयों!…बहनों!
आपके सामने आपनी बात कहने का और आपकी बातों को सुनने के  सापेक्षिक अधिकार ने मुझे अपने शब्दों के साथ यहाँ लाकर खडा कर दिया है| मष्तिस्क की व्यापकता के लिये सही कसौटी पर कसे जाने वाले पहलुओं से भरा संवाद ही हमारी मानोदशा को अनुशासित कर निर्माण कार्य में हमारे अमूल्य योगदान को स्थापित कर सकता है| 
नई तकनीक और उसकी उपलब्धियां समाज के निर्माण में कैसी और कितनी भूमिका निभा सकेंगी इस बात का निर्णय उन तकनीकों को आत्मसाथ करने वाले लोगों की मानसिकता पर ही पूरी तरह से निर्भर करता है| अगर मैं भारत देश के परिप्रेक्ष्य में तकनीक के अविर्भाव की बात करूँ तो इस सन्दर्भ में यहाँ के लोगों की मानसिकता का यह शैशव काल है, एक ऐसा समय जिसमें परिणाम का बोध किए बिना ही अपनी मनमानी करने की जड़ता का स्वाभाव उनकी कुंठा की ओर संकेत करता है| इस स्थिति और परिस्थिति में उम्र के अंतिम पड़ाव को पार कर रहे हमारे बुजुर्ग हों या हमारे युवा साथी दोनों ही अपरिपक्वता का ग्रास बनतें हैं| समाज के निर्माण में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले युवाओं और बुजुर्गों को ही आज़ सबसे ज्यादा सजग और सचेत होने की ज़रूरत है| इन्टरनेट के माध्यम से ब्लॉग पर शब्दों और तस्वीरों से नकारात्मक सोच और समझ को उकेरने वालों को यह ज़रूर सोचना पडेगा की एक सभ्य इंसान कहे जाने के नाते समाज के लिए आखिरकार उनकी क्या जिम्मेदारी बनती है? इन हालातों में ना ही वे अपने बच्चों को ठीक संस्कार दे सकेंगे और ना ही समाज के निर्माण में अपनी सकारात्मक भागीदारी|
आपकी टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है, यह केवल मात्र शब्दों के हेर-फेर नहीं अपितु आपके वैचारिक चरित्र का संकल्प भी होगा की ऐसी नकारात्मक, आपत्तिजनक और आक्रामक मानसिकता  का हम आपनी सार्थकता के अनुरूप उसका समूल नष्ट करें ताकि आने वाली हमारी नस्लें इस मानसिक विपदा से सुरक्षित रह सकें|  आपकी टिप्पणिओं का सदैव सादर स्वागत है|
 
शुभकामनाओं समेत!
आपका शुभेक्षु!
“यायावर”

गहराते संबंधों के बीच, फासला तय करता एक राही!

May 4, 2009

कुछ दिनों से मैं,
निर्वात में हूँ|
मसलन, रात और दिन के,
गहराते संबंधों के बीच,
फासला तय करता एक राही|

पड़ाव भी अजीब-से,
कई राही अनजाने,
सूरतें अनजानी,
माथे पर गठरी लादे,
देखते हैं मुझे, टकटकी लगाए|

सोचता हूँ मैं!
अक्सर कुछ दिनों से,
देखता हूँ जब भी उनको|
और अन्तः संवाद की प्रक्रिया में,
पूछ बैठता हूँ अपने आपसे|
जाने क्या-क्या होगा गठरी में,
शायद! जीने का शाज़ो-सामान,
या फिर, रिश्तों की बन्दर-बाँट में बचा,
साँसों का टुकडा|

व्यक्तिगत होते ही,
तंद्रा भंग होती,
और अंतरद्वंद का परिणाम,
आरेखों से मेरी भितिचित्र को टटोल,
मुझसे उगलवा लेता,
मेरे मन की बात को|

हाँ, मैंने भी तो यही बांध रखा है,
औरों की तरह अपनी गठरी में भी|
जो मेरे कंधे पर लदी,
माथे से सटी,
बन्दर-बाँट में बची,
मेरे हिस्से के होने का एहसास कराती|

कुछ दूर तक,
फिर थोडी और दूर तक,
चलते-चलते मेरे पाँव थक-से जाते|
थकान मिटाने के प्रयास में,
कुछ दिनों से मैं,
निर्वात में हूँ|
मसलन, रात और दिन के,
गहराते संबंधों के बीच,
फासला तय करता एक राही|


तुम निर्गुण के निर्माण हो!

May 4, 2009

हे! नवयुग के नवदीपक!
तुम नवयुग के अभिमान हो!
सम्मान हो!
वर्तमान हो!
तुम ही चिर महान हो!
तुम पौरुषता के पुंज हो!
स्वयं अपनी पहचान हो!

क्षण-भंगुर नहीं प्रसस्ति तुम्हारी,
तुम श्रृष्टि के अस्तित्व समान हो|
हे मृतुन्जय!
हे धनञ्जय!
तुम चिर रत्न के प्राण हो|
क्यूँ टूटे तेरा संबल,
तुम धैर्यवान! कृपा-मुस्कान हो!
नहीं अभेद कोई लक्ष्य तेरा,
तुम स्वयं अर्जुन की बाण हो!

हे! सर्वश्रेष्ट कृति धरा के,
तुम सर्वगुण सम्पन्न संज्ञान हो!
परिचय ते़रा! तुम में क्या अवगुण?
तुम तो निर्गुण के निर्माण हो!


क्या हुआ है? ये परिवर्तन!

May 4, 2009

बीच अधर में टंगी,
मेरे विचारों की अस्थि,
ठीक उसी ठुठे पेड़ की तरह,
जो सिंचित होता रहा,
जब तक उपजाऊ थी धरती|
वर्षा की बूंदें स्वभावत:,
श्रृंगार परंपरा की|
पर परिवर्तन का बादल,
क्या इतना घनघोर?
जो क्षितिज की परिधि को,
परिभ्रमित कर दे|

नहीं! नहीं चाहते हम,
अस्थि बनने देना अपने विचारों को,
जो मलबे के ढेर तले दबी,
करती है सिंचित भौतिकता को,
भाउकता को नहीं|

क्या हुआ है? ये परिवर्तन!
कि भूख लगने पर,
चबाएं हो हमने,
ईंट और पत्थर|
दर्द के स्पर्श से,
खिलखिलाया हो हमारा चेहरा,
या फिर जान फूंकते देते हों हम,
हर पथराई लाशों में|
फिर क्या गंतव्य है?
परिवर्तन का|
क्या इतना ही,
कि जीवन को,
जीने की समझ परे रख,
इस कशमकश में,
कि चादर से,
बाहर पैर पसारो!


अकेलापन!

May 4, 2009

मेरी सबसे बड़ी कमजोरी,
महसूस करता हूँ मैं,
अकेलापन!
जो निश्चय ही मुझे,
अलग करती है,
जब होता हूँ मैं,
सैकडों की भीड़ में|
वही एकाकीपन!

बरबस संवेदनाओं के,
सागर का उमड़ना|
लहरों की सिलवटों में,
न जाने रेत के कितने कण|
फिर भी हर क्षण,
वही अकेलापन!

डूबती हुई नब्जों में,
जमता हुआ खून|
रिश्तों में कम्पन्न,
आस्था में परिवर्तन|
दम घुटता है मेरा,
क्यूँ जीने का सम्मोहन!
आँखों में आसमान,
ज़मी पर पैरों के निशान|
रेत के टीले,
फिर जोरों का तूफ़ान!


यह चरित्र भी जीवन का, विचित्र व्यथा पर रोता है!

May 2, 2009

रुद्र छुपा जिस रज-कण में,
गाती सरिता है यश-धारा|
अडिग! अचल! अचला-सा,
वातों से जो कभी ना हारा|

अम्बर का आनन सुना है,
पनघट पर घट-घट मातम है|
चिल्लाती चमक है चीख-चीख,
फिर भी कहो जाता क्या तम है?

वातायन तब आयाम बने,
पुरुषार्थ भी कलरव गाता है|
आहुति देता जो प्रण पर,
निज त्याग दंभ “निर्माता” है|

यह चरित्र भी जीवन का,
विचित्र व्यथा पर रोता है|
मृत्यु के पावन परिणय से,
चिर साध्य को सोता है|